वो शपथ जिसने इतिहास बदल दिया: कैसे जन्मतिथि ने एक जज को मुख्य न्यायधीश की कुर्सी से दूर कर दिया

भारतीय सुप्रीम कोर्ट की गरिमामयी दीवारों के भीतर, जहाँ न्याय अंधा माना जाता है, 1980 के दशक के अंत में एक ऐसा घटनाक्रम घटा जिसे आज भी केवल वरिष्ठ वकील और न्यायिक जानकार फुसफुसाते हुए याद करते हैं। यह कहानी है प्रतिद्वंद्विता, अलिखित परंपराओं और एक शपथ की—जिसने भारत की न्यायिक व्यवस्था के इतिहास की दिशा बदल दी। इसके केंद्र में थे दो दिग्गज—न्यायमूर्ति ए.एम. अहमदी और न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह—जिनकी एक साथ 14 दिसंबर 1988 को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) की कुर्सी के लिए एक अनकहा संघर्ष छेड़ दिया।

वह नियुक्ति जिसने संघर्ष की नींव रखी

उस ऐतिहासिक दिसंबर की तारीख को, जब अहमदी और सिंह दोनों सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने, उनके न्यायिक सफर पूरी तरह अलग थे। अहमदी, गुजरात हाईकोर्ट के अनुभवी जज थे, जो न्यायिक सेवा की पारंपरिक सीढ़ी चढ़ते हुए शीर्ष अदालत तक पहुँचे थे। वहीं कुलदीप सिंह सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त हुए वरिष्ठ अधिवक्ता थे, जिनका न्यायिक अनुभव शून्य था। एक अलिखित परंपरा के अनुसार, जब एक हाईकोर्ट जज और एक बार से नियुक्त वकील एक ही दिन सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होते हैं, तो न्यायिक सेवा से आए जज को वरीयता मिलती है। इस नियम के अनुसार अहमदी वरिष्ठ माने गए और 1994 में मुख्य न्यायाधीश बनने की दिशा में अग्रसर थे।

लेकिन कुलदीप सिंह ने इस पर आपत्ति जताई। उनके आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, उनका जन्म 1 जनवरी 1932 को हुआ था, जबकि अहमदी का जन्म 25 मार्च 1932 को हुआ था। सिंह ने तर्क दिया कि वरिष्ठता का निर्धारण उम्र के आधार पर होना चाहिए न कि न्यायिक कार्यकाल के आधार पर—यह बहस अब केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई थी, बल्कि मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी के लिए एक निर्णायक लड़ाई बन चुकी थी।

एक शपथ और पलट गई किस्मत

न्यायिक गलियारों में निर्णय की घड़ी तब आई जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर.एस. पाठक ने अगस्त 1988 में कुलदीप सिंह को बुलाकर उनके नियुक्ति की जानकारी दी। उन्होंने आश्वस्त किया कि शपथग्रहण समारोह में सिंह को पहले शपथ दिलाई जाएगी जिससे उनकी वरिष्ठता अहमदी से ऊपर मानी जाएगी। लेकिन जैसे-जैसे समारोह नजदीक आया, सरकार ने अंतिम क्षण में आदेश पलट दिया। अहमदी ने पहले शपथ ली और सिंह कनिष्ठ माने गए। सिंह इस फैसले से बेहद आहत हुए।

इस अचानक हुए बदलाव के पीछे कई तरह की चर्चाएँ थीं। माना गया कि एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जज ने अपने मित्र अहमदी की वरीयता सुनिश्चित करने के लिए पर्दे के पीछे से हस्तक्षेप किया। सिंह ने नियुक्ति से पीछे हटने तक का मन बना लिया था, लेकिन मुख्य न्यायाधीश पाठक की मनुहार पर वे शपथ लेने को तैयार हुए। वर्षों बाद, दूसरे न्यायाधीशों के मामले में सुनाए गए फैसले में सिंह की पीड़ा झलक उठी जब उन्होंने लिखा— कोई नहीं जानता कि अंतरवैयक्तिक वरिष्ठता कैसे तय की जाती है। यह कटाक्ष आज भी याद किया जाता है।

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प्रतिद्वंद्विता से बनी विरासत

मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी भले ही उनके हाथ से फिसल गई, लेकिन न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह ने अपने फैसलों के ज़रिए ‘ग्रीन जज’ के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी। पर्यावरण संबंधी ऐतिहासिक निर्णयों के कारण वे भारत की न्यायिक पर्यावरणशास्त्र के स्तंभ बन गए। न्याय के लिए उनका जुनून अटूट था, लेकिन दिल की टीस कभी नहीं मिट सकी। निजी वार्ताओं और कुछ निर्णयों में उन्होंने उस कुर्सी की ओर इशारा किया जो उन्हें कभी नहीं मिली।

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