सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश: चार्जशीट दाखिल होने के बाद हिरासत की आवश्यकता नहीं, ट्रायल कोर्ट में पेश होने पर मिलेगी जमानत

सुप्रीम कोर्ट ने एक कॉर्पोरेट रिफंड विवाद से जुड़े धोखाधड़ी के मामले में निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं के ट्रायल कोर्ट में पेश होने पर उन्हें जमानत दे दी जाए। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निस्तारण करते हुए कहा कि चूंकि मामले में चार्जशीट (आरोप पत्र) पहले ही दाखिल की जा चुकी है, इसलिए “ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ताओं को हिरासत में लिया जाए।”

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला आगरा के ताजगंज पुलिस स्टेशन में 9 जून, 2025 को दर्ज एफआईआर संख्या 396/2025 से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं, श्रीमती शालिनी भटेजा और एक अन्य ने शुरू में एफआईआर को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने तर्क दिया था कि एफआईआर जानबूझकर उत्पीड़न करने के इरादे से और दुर्भावनापूर्ण तरीके से दर्ज कराई गई थी।

हाईकोर्ट ने एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया था और दुर्भावनापूर्ण इरादे की दलील को खारिज कर दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को 60 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया था और उन्हें नियमित या अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने की छूट दी थी। इस आदेश से असंतुष्ट होकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता आशीष पांडेय ने तर्क दिया कि पार्टियों के बीच का विवाद अनिवार्य रूप से दीवानी (civil) प्रकृति का है और इसमें आपराधिक शिकायत दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि “एक ही तथ्यों पर विभिन्न अदालतों में तीन अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं।”

दूसरी ओर, तीसरे प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता अर्धेंदुमौली कुमार प्रसाद ने तर्क दिया कि इस मामले में “स्पष्ट धोखाधड़ी” शामिल है। उन्होंने कहा कि रिफंड, जो कथित तौर पर दिया गया था, उसे “छलपूर्वक उसी नाम के किसी अन्य व्यक्ति के खाते में जमा कर दिया गया।”

वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि भुगतान किए जाने के बाद भी रिफंड की लगातार मांग करना “कॉर्पोरेट इकाई को धोखा देने के लिए आरोपियों के बीच रची गई साजिश और मिलीभगत” का परिणाम था। उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि कॉर्पोरेट इकाई वर्तमान में नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के समक्ष है और एक अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) नियुक्त किया गया है।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) को पक्षकार बनाने के आवेदन को स्वीकार कर लिया।

कोर्ट ने एक ही तथ्यों पर शुरू की गई कई कार्यवाहियों का संज्ञान लिया:

  1. दिल्ली की कार्यवाही: कड़कड़डूमा कोर्ट, दिल्ली के मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली शिकायत (CC No. 1971/2023)।
  2. आगरा की कार्यवाही (पूर्व): मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, आगरा के समक्ष दायर आवेदन (CC No. 19488/2025), जिसे पुलिस द्वारा विवाद को दीवानी प्रकृति का बताए जाने के बाद वापस ले लिया गया था।
  3. वर्तमान एफआईआर: मौजूदा अपील का विषय (एफआईआर संख्या 396/2025)।
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उत्तर प्रदेश राज्य ने जवाबी हलफनामा दायर कर बताया कि वर्तमान एफआईआर की जांच पूरी हो चुकी है। 11 सितंबर, 2025 को कोर्ट में फाइनल रिपोर्ट (चार्जशीट) संख्या 144/2025 प्रस्तुत की गई थी।

पीठ ने दर्ज किया कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि अन्य समानांतर कार्यवाहियों को आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने आदेश दिया कि कड़कड़डूमा कोर्ट के समक्ष कार्यवाही को बंद कर दिया जाए।

निर्णय

यह देखते हुए कि वर्तमान मामले में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“जहां तक पुलिस स्टेशन ताजगंज, जिला आगरा से संबंधित सीसी नंबर 396/2025 की वर्तमान कार्यवाही का प्रश्न है, चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, ऐसी परिस्थिति में, ऐसा कोई कारण नहीं है कि याचिकाकर्ताओं को हिरासत में लिया जाए।”

कोर्ट ने निम्नलिखित प्रमुख निर्देश जारी किए:

  • याचिकाकर्ताओं को एक महीने के भीतर क्षेत्राधिकार वाली अदालत (Jurisdictional Court) के समक्ष पेश होना होगा।
  • उनके पेश होने पर, “उन्हें जमानत दी जाएगी और उसी दिन आरोप (charges) सुनाए जाएंगे।”
  • जमानत उन शर्तों पर दी जाएगी जो ट्रायल कोर्ट को संतोषजनक लगें।
  • याचिकाकर्ताओं को मामले के शीघ्र निस्तारण में सहयोग करने का निर्देश दिया गया है।
  • शिकायतकर्ता का प्रतिनिधित्व अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) द्वारा किया जा सकेगा।
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कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि आईआरपी को विषय वस्तु से परिचित पूर्व अधिकारियों या निदेशकों को गवाह के रूप में बुलाने का अधिकार होगा। इन निर्देशों के साथ विशेष अनुमति याचिका का निस्तारण कर दिया गया।

केस डिटेल्स (Case Details):

  • केस का नाम: श्रीमती शालिनी भटेजा और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 11375 ऑफ 2025 (2026 INSC 28)
  • बेंच: जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
  • याचिकाकर्ताओं के वकील: श्री आशीष पांडेय
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री अर्धेंदुमौली कुमार प्रसाद (वरिष्ठ अधिवक्ता)

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