मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर आवेदन को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी वाद (Suit) को शुरुआती स्तर पर केवल उसी स्थिति में खारिज किया जा सकता है जब वह वाद-पत्र (Plaint) में किए गए कथनों और वादी द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर कानूनन वर्जित प्रतीत हो। जस्टिस आशीष श्रोती की बेंच ने कहा कि प्रतिवादी द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों, जैसे कि पिछले मुकदमों के आदेश जिन्हें वादी ने रिकॉर्ड पर नहीं रखा है, के आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद मुरैना के ग्राम हिंगोना खुर्द में स्थित सर्वे नंबर 415/2 की भूमि से जुड़ा है। उत्तरदाताओं (वादियों) ने याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादियों) के खिलाफ मालिकाना हक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए एक सिविल सूट (RCS-A No. 45/2022) दायर किया था।
नोटिस मिलने पर, याचिकाकर्ताओं ने आदेश 7 नियम 11 CPC के तहत आवेदन देकर वाद को खारिज करने की मांग की। उनका तर्क था कि चूंकि इसी संपत्ति और राहत के लिए पहले दायर किया गया एक मुकदमा 18 अगस्त 2021 को ‘अबेट’ (Abate) यानी समाप्त हो चुका था, इसलिए नया मुकदमा आदेश 22 नियम 9 CPC के तहत वर्जित है। ट्रायल कोर्ट ने 13 सितंबर 2022 को इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (Res Judicata) का मुद्दा कानून और तथ्यों का मिश्रित प्रश्न है जिसे ट्रायल के दौरान ही तय किया जा सकता है।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि वादियों ने पहले भी प्रतिकूल कब्जे (Adverse Possession) के आधार पर ऐसा ही मुकदमा दायर किया था, जो कानूनी वारिसों को रिकॉर्ड पर न लाने के कारण समाप्त हो गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान मुकदमा “अर्थहीन मुकदमेबाजी” है और वादियों ने ‘चतुराईपूर्ण ड्राफ्टिंग’ (Clever Drafting) के जरिए इसे एक नया कारण (Fresh Cause of Action) दिखाने की कोशिश की है ताकि वे आदेश 22 नियम 9 की कानूनी बाधा से बच सकें।
वहीं, वादियों के वकील ने दलील दी कि साक्ष्यों के अभाव में रेस ज्यूडिकाटा के मुद्दे पर निर्णय नहीं लिया जा सकता। उन्होंने कहा कि पिछला मुकदमा लंबित रहने के दौरान पक्षों के बीच एक “आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट” हुआ था, जिसका प्रतिवादियों ने उल्लंघन किया, जिससे एक नया वाद-कारण उत्पन्न हुआ।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के दाहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली (2020) मामले का हवाला देते हुए आदेश 7 नियम 11 CPC के दायरे का परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि किसी सिविल कार्यवाही को शुरुआत में ही खत्म करने की शक्ति “कठोर” है, लेकिन इसका उपयोग तभी होना चाहिए जब मुकदमा स्पष्ट रूप से कष्टप्रद हो या उसमें वाद-कारण का अभाव हो।
सुनवाई के दौरान कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां निम्नलिखित रहीं:
- वाद-पत्र की जांच: “अदालत का यह कर्तव्य है कि वह वाद-पत्र में किए गए कथनों की जांच कर यह निर्धारित करे कि क्या इसमें वाद-कारण का खुलासा होता है… इसे वादी द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।”
- शुरुआती स्तर पर प्रतिवादी के साक्ष्य अमान्य: हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि “लिखित बयान (Written Statement) में प्रतिवादी द्वारा लिए गए बचाव और वाद को खारिज करने के आवेदन में दिए गए तथ्यों को इस स्तर पर प्रासंगिक नहीं माना जा सकता।”
- प्रतिवादी के दस्तावेजों का निष्कासन: जस्टिस श्रोती ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ताओं ने पिछले मुकदमे के आदेशों पर भरोसा किया था, लेकिन चूंकि ये दस्तावेज वादी द्वारा दाखिल नहीं किए गए थे, इसलिए इन्हें इस स्तर पर आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादी द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों को आदेश 7 नियम 11 CPC के आवेदन के निपटारे के लिए नहीं देखा जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि वादियों ने अपने वाद-पत्र के पैरा 7 में ‘कोर्ट के बाहर समझौते’ का उल्लेख किया है। इस पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यदि वादी वर्तमान मुकदमे में कोर्ट के बाहर हुए समझौते के तथ्य को साबित कर देते हैं, तभी उनके पास नया वाद-कारण होगा, अन्यथा मुकदमा आदेश 22 नियम 9 CPC के तहत वर्जित माना जाएगा।”
फैसला
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही पाया और निष्कर्ष निकाला कि मुकदमे की विचारणीयता (Maintainability) का प्रश्न ट्रायल का विषय है। कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए 13 सितंबर 2022 के आदेश को बरकरार रखा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह “उपयुक्त प्रारंभिक मुद्दा (Preliminary Issue) तय करके इस मुकदमे की विचारणीयता के मुद्दे पर सुनवाई करे।”
मामले का विवरण:
- केस टाइटल: लक्ष्मीनारायण शर्मा और अन्य बनाम श्रीमती सरवती देवी और अन्य
- केस नंबर: मिसलेनियस पेटिशन नंबर 1168/2023
- हाईकोर्ट बेंच: माननीय न्यायमूर्ति आशीष श्रोती
- आदेश की तिथि: 17 मार्च, 2026

