एनएसए के तहत अभ्यावेदन सुनने के डीएम के अधिकार पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल को ‘लार्जर बेंच’ (बड़ी बेंच) के पास भेज दिया है। अदालत यह तय करेगी कि क्या जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास एनएसए के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति (detenue) का अभ्यावेदन (representation) सुनने का अधिकार है, और क्या इस अधिकार के बारे में जानकारी न देना पूरी हिरासत प्रक्रिया को अवैध बनाता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला ‘विकास तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ (रिट पिटीशन नंबर 327/2026) से जुड़ा है। विदिशा निवासी विकास तिवारी को 20 अक्टूबर 2025 को हुई एक आपराधिक घटना के बाद एनएसए की धारा 3 के तहत हिरासत में लिया गया था। पुलिस थाना कोतवाली, विदिशा में उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इसके बाद, जिला मजिस्ट्रेट विदिशा ने 4 नवंबर 2025 को हिरासत का आदेश जारी किया, जिसे बाद में 4 फरवरी 2026 को अगले तीन महीनों के लिए बढ़ा दिया गया। याचिकाकर्ता ने इन आदेशों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री सोमनाथ सेठ और श्री सुशील गोस्वामी ने तर्क दिया कि हिरासत की कार्रवाई प्रक्रियात्मक रूप से गलत है। उनका मुख्य तर्क यह था कि जिला मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता को यह नहीं बताया कि वह स्वयं डीएम के समक्ष भी अपना पक्ष (representation) रख सकता है। आदेश में केवल राज्य सरकार, सलाहकार बोर्ड और केंद्र सरकार के पास अभ्यावेदन देने की बात कही गई थी।

याचिकाकर्ता ने एनएसए की धारा 8 और 14 का हवाला देते हुए कहा कि जो प्राधिकारी आदेश पारित करता है, उसके पास उसे रद्द करने का भी अधिकार होता है। इसलिए, जब तक राज्य सरकार हिरासत की पुष्टि नहीं कर देती, तब तक डीएम को अभ्यावेदन पर विचार करना चाहिए। इसके समर्थन में ‘कमल खरे बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ (2021) और सुप्रीम कोर्ट के ‘कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल’ मामले का हवाला दिया गया।

READ ALSO  सुनवाई के अंतिम चरण में स्थानांतरण आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री विवेक खेड़कर ने दलील दी कि एनएसए का कानूनी ढांचा कोफेपोसा (COFEPOSA) जैसे अन्य कानूनों से अलग है। उन्होंने कहा कि एनएसए की धारा 3(4) के तहत डीएम का आदेश केवल 12 दिनों तक प्रभावी रहता है जब तक कि उसे राज्य सरकार की मंजूरी न मिल जाए। ऐसे में राज्य सरकार ही अभ्यावेदन तय करने वाली मुख्य ‘उपयुक्त प्राधिकारी’ है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीजन बेंच ने एनएसए के प्रावधानों का बारीकी से विश्लेषण किया। बेंच ने गौर किया कि धारा 3(4) के तहत डीएम को हिरासत की सूचना तुरंत राज्य सरकार को देनी होती है। हाईकोर्ट ने कहा:

READ ALSO  कोर्ट एक मुस्लिम व्यक्ति को ट्रिपल तालक देने या एक से अधिक महिलाओं से शादी करने से नहीं रोक सकतीः हाईकोर्ट

“राज्य सरकार द्वारा अनुमोदन (approval) का प्रभाव यह है कि उस तारीख से हिरासत को राज्य सरकार के आदेश द्वारा अधिकृत माना जाता है और अनुमोदन की तारीख से राज्य सरकार ही हिरासत प्राधिकारी (detaining authority) बन जाती है।”

अदालत ने यह भी पाया कि ‘कमल खरे’ मामले में दिए गए फैसले और सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘कमलेशकुमार ईश्वरदास पटेल’ मामले में की गई टिप्पणियों के बीच विरोधाभास की स्थिति बन रही है। डिवीजन बेंच ने टिप्पणी की कि एक बार जब डीएम मामला राज्य सरकार को भेज देता है, तो वह ‘फंक्टस ऑफिशियो’ (कार्यमुक्त) हो जाता है। बेंच ने कहा:

“इसलिए, डीएम द्वारा अभ्यावेदन पर विचार करने का कोई तर्क नजर नहीं आता। ऐसा करना हिरासत में लिए गए व्यक्ति के लिए कोई प्रभावी उपाय नहीं होगा।”

अदालत का निर्णय

डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि डीएम के अधिकार क्षेत्र और प्रक्रिया की वैधता को लेकर स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है। इसी के चलते हाईकोर्ट ने पांच सवाल माननीय मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किए हैं ताकि इन्हें एक बड़ी बेंच द्वारा सुलझाया जा सके:

  1. क्या ‘कमलेशकुमार’ मामले में दी गई स्पष्टता के आधार पर डीएम के पास अभ्यावेदन पर विचार करने का कोई अधिकार नहीं है?
  2. क्या ‘कमल खरे’ मामले में हाईकोर्ट की फुल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कानून की गलत व्याख्या की थी?
  3. क्या एनएसए की धारा 8 के तहत अभ्यावेदन पर केवल ‘उपयुक्त सरकार’ ही विचार कर सकती है?
  4. यदि डीएम ने यह जानकारी नहीं दी कि उनके समक्ष भी पक्ष रखा जा सकता है, तो क्या इससे पूरी प्रक्रिया रद्द हो जाती है?
  5. क्या ‘कमल खरे’ मामले का फैसला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के फैसलों के आलोक में सही कानून स्थापित करता है?
READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने मृत्यु और स्थायी विकलांगता के दावों में अंतर स्पष्ट किया; 14 वर्षीय सड़क हादसा पीड़ित के माता-पिता को मुआवजा बढ़ाया

हाईकोर्ट ने फिलहाल याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है और रजिस्ट्री को मामला बड़ी बेंच के गठन के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

केस विवरण

  • केस का शीर्षक: विकास तिवारी बनाम मध्य प्रदेश राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: रिट पिटीशन संख्या 327/2026
  • बेंच: जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव
  • तारीख: 31 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles