मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई साझेदार (पार्टनर) फर्म में अपने विशिष्ट पूंजी निवेश को प्रमाणित करने में विफल रहता है, तो वह फर्म को प्राप्त होने वाले लाभ या किसी आर्बिट्रेशन अवार्ड की राशि में एक-तिहाई हिस्सेदारी का दावा नहीं कर सकता।
जस्टिस विवेक जैन की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही फर्म को प्राप्त पूरी राशि को लाभ माना जाए, लेकिन आर्बिट्रेटर केवल निवेशित पूंजी के अनुपात में ही हिस्सा आवंटित कर सकता है। ठोस सबूतों के अभाव में आर्बिट्रेटर द्वारा दावे को खारिज करने के निर्णय को हाईकोर्ट ने उचित ठहराया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मेसर्स गोधरा ब्रिक एंटरप्राइजेज नामक फर्म से संबंधित है, जिसका गठन 26 जुलाई 1985 को एक पार्टनरशिप डीड के माध्यम से हुआ था। इसमें अपीलकर्ता और प्रतिवादी नंबर 1 और 2 (जो पिता-पुत्र हैं) शामिल थे। अपीलकर्ता, प्रतिवादी नंबर 1 का साला है।
फर्म को 25 मार्च 1985 को नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (NTPC) से ईंटों की आपूर्ति का अनुबंध मिला था। उल्लेखनीय है कि यह अनुबंध अपीलकर्ता के पार्टनरशिप में शामिल होने से पहले का था। NTPC के साथ भुगतान विवाद के बाद, 25 मई 2004 को आर्बिट्रेटर श्री एन.एस. चौधरी ने फर्म के पक्ष में अवार्ड पारित किया। प्रतिवादी नंबर 1 ने इस अवार्ड की पूरी राशि अपने व्यक्तिगत खाते में प्राप्त की। इसके बाद अपीलकर्ता ने इस राशि में एक-तिहाई हिस्से की मांग करते हुए दूसरा आर्बिट्रेशन शुरू किया।
दूसरे आर्बिट्रेटर श्री एस.एल. गुप्ता ने अपीलकर्ता के दावों को खारिज कर दिया, जिसे 13 मई 2015 को जिला न्यायालय ने भी बरकरार रखा। इसके बाद अपीलकर्ता ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलीएशन एक्ट, 1996 की धारा 37 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पार्टनरशिप डीड की धारा 6 के अनुसार, सभी भागीदारों का निवेश समान होना था और लाभ-हानि में प्रत्येक का एक-तिहाई हिस्सा तय था। यह भी तर्क दिया गया कि जिला न्यायालय ने बिना आर्बिट्रेटर के रिकॉर्ड मंगवाए ही आवेदन खारिज कर दिया। अपीलकर्ता ने दावा किया कि उसने 1979 और 1981 में निवेश किया था और उसका ट्रैक्टर फर्म की पूंजी का हिस्सा था।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि जब NTPC का अनुबंध मिला था, तब अपीलकर्ता फर्म का हिस्सा नहीं था। यह भी कहा गया कि फर्म गठन के कुछ समय बाद ही भंग हो गई थी और अपीलकर्ता ने कोई वास्तविक पूंजी निवेश नहीं किया था। प्रतिवादियों के अनुसार, अपीलकर्ता केवल अपनी नियुक्ति से पहले किए गए कार्यों के अवार्ड में हिस्सा पाने का प्रयास कर रहा है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने पाया कि NTPC कार्य के लिए निविदा 2 अगस्त 1984 को जारी हुई थी और कार्यादेश 25 मार्च 1985 को मिला था, जबकि अपीलकर्ता 26 जुलाई 1985 को पार्टनर बना। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“NTPC के साथ समझौते के निष्पादन और कार्यादेश की तिथि पर अपीलकर्ता फर्म का हिस्सा नहीं था और वह केवल 26.07.1985 को फर्म का भागीदार बना।”
निवेश के संबंध में हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के 1979 और 1981 के निवेश दावों का 1985 की पार्टनरशिप डीड में कोई उल्लेख नहीं था। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि यह साबित करने का भार अपीलकर्ता पर था कि उसने साझेदारी में शामिल होने के बाद क्या निवेश किया।
हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेटर के निष्कर्षों को उद्धृत किया:
“आर्बिट्रेटर ने अपने अवार्ड में स्पष्ट रूप से कहा है कि अपीलकर्ता द्वारा पार्टनरशिप फर्म में अपना निवेश न बताने और उसे साबित न कर पाने के कारण, आर्बिट्रेटर फर्म को मिली राशि का 1/3 हिस्सा उसे नहीं दे सकता… भले ही NTPC से प्राप्त पूरी राशि को फर्म का लाभ माना जाए, तब भी आर्बिट्रेटर केवल अपीलकर्ता द्वारा निवेशित पूंजी के अनुपात में ही हिस्सा दे सकता था।”
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 34 और धारा 37 के तहत न्यायालय का अधिकार क्षेत्र “अत्यंत सीमित” है। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जिला न्यायालय ने श्री एस.एल. गुप्ता द्वारा पारित अवार्ड में हस्तक्षेप न करके कोई गलती नहीं की है।
अपील में कोई सार न पाते हुए हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
केस का विवरण
केस का नाम: भगवंती और अन्य बनाम मेजर (रिटायर्ड) एस.आर. गोधरा और अन्य
केस संख्या: आर्बिट्रेशन अपील संख्या 56/2015
पीठ: न्यायमूर्ति विवेक जैन

