माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद के कारण नाबालिग का पासपोर्ट नहीं रोका जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि माता-पिता के बीच चल रहे वैवाहिक या आपराधिक विवादों के आधार पर किसी नाबालिग बच्चे का पासपोर्ट आवेदन लंबित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि पासपोर्ट प्राप्त करना और विदेश यात्रा करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के मौलिक अधिकार का हिस्सा है और इसे माता-पिता के आपसी झगड़ों के कारण मनमाने ढंग से नकारा नहीं जा सकता।

न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने दो वर्षीय नाबालिग बच्ची की ओर से उसकी मां द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याची पोम जायसवाल, जो दो वर्ष की नाबालिग है, ने अपनी मां के माध्यम से 17 जनवरी, 2025 को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। 27 जनवरी, 2025 को आवेदन पंजीकृत किया गया। याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद, उसके आवेदन पर कोई निर्णय नहीं लिया गया।

कोर्ट को सूचित किया गया कि बच्ची के माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है। मां ने पिता और उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ जौनपुर के महिला थाने में आईपीसी की धारा 498-ए, 323, 504, 506, 406 और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत एफआईआर (केस क्राइम नंबर 0042 ऑफ 2024) दर्ज कराई है।

याची का तर्क था कि केवल आपराधिक मामले और वैवाहिक विवाद के लंबित होने के कारण, पासपोर्ट प्राधिकरण ने मौखिक रूप से पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया था।

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पक्षों की दलीलें

याची का पक्ष: याची के वकील ने दलील दी कि वैवाहिक विवाद के कारण पिता सहयोग नहीं कर रहे हैं और पासपोर्ट जारी करने के लिए सहमति देने को तैयार नहीं हैं। यह तर्क दिया गया कि “पिता की ओर से असहयोग को नाबालिग बच्चे के अधिकारों का उल्लंघन करने का स्वीकार्य कारण नहीं माना जा सकता,” जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षित हैं। वकील ने जोर देकर कहा कि पासपोर्ट प्राप्त करना व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।

प्रतिवादियों का पक्ष: भारत संघ और पासपोर्ट अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने लिखित निर्देश प्रस्तुत करते हुए कहा कि आवेदन को पूरी तरह से खारिज नहीं किया गया है। 22 अप्रैल, 2025 को याची को एक पत्र भेजकर कानूनी आवश्यकताओं का पालन करने के लिए विशिष्ट दस्तावेजों के साथ कार्यालय में उपस्थित होने के लिए कहा गया था। उन्होंने कहा कि अनुपालन के बाद, कानून के अनुसार आवेदन को संसाधित किया जाएगा।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

कोर्ट के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि “क्या किसी नाबालिग बच्चे का पासपोर्ट आवेदन केवल उसके माता-पिता के बीच वैवाहिक या आपराधिक विवादों के कारण लंबित रखा जा सकता है।”

अनुच्छेद 21 के तहत यात्रा का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1967) के फैसले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि विदेश यात्रा का अधिकार जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल है। पीठ ने महेश कुमार अग्रवाल बनाम भारत संघ और अन्य (2025) के हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को “कठोर बाधाओं” में नहीं बदला जा सकता।

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पासपोर्ट अधिनियम की धारा 6 कोर्ट ने पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6 की जांच की, जो पासपोर्ट देने से इनकार करने के विशिष्ट आधारों को सूचीबद्ध करती है, जैसे कि संप्रभुता को खतरा, राष्ट्रीय सुरक्षा, या आवेदक के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही।

पीठ ने कहा:

“प्राधिकारियों के पास अन्य बाहरी या प्रशासनिक आधारों पर पासपोर्ट देने से इनकार करने की सामान्य या विवेकाधीन शक्ति नहीं है। एक नाबालिग के वर्तमान मामले में, ऐसी कोई स्थिति मौजूद नहीं है जो आवेदन को अस्वीकार करने को उचित ठहराए। प्राकृतिक अभिभावकों के बीच माता-पिता के विवाद या लंबित वैवाहिक और आपराधिक मामले इनकार का वैध वैधानिक कारण नहीं बन सकते।”

पासपोर्ट नियम और अनुलग्नक-सी (Annexure-C) कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पासपोर्ट नियम, 1980 और पासपोर्ट मैनुअल ऐसी स्थितियों के लिए तंत्र प्रदान करते हैं। विशेष रूप से, अनुलग्नक-सी (Annexure-C) एक माता-पिता को घोषणा पत्र प्रस्तुत करने की अनुमति देता है जब दूसरे माता-पिता की सहमति उपलब्ध नहीं होती है।

कोर्ट ने नोट किया:

“पासपोर्ट नियमों में ऐसा कोई निषेध नहीं है कि पिता की सहमति के बिना नाबालिग बच्चे को पासपोर्ट जारी नहीं किया जा सकता है। यहां तक ​​कि ऐसा कोई प्रावधान भी नहीं है कि किसी निषेधाज्ञा (prohibitory order) के अभाव में, कोर्ट की अनुमति आवश्यक है।”

पीठ ने आगे कहा कि जब अनुलग्नक-सी के तहत घोषणा प्रस्तुत की जाती है और पासपोर्ट जारी करने पर रोक लगाने वाला कोई अदालती आदेश नहीं है, तो पासपोर्ट प्राधिकरण “निराधार आपत्तियों के आधार पर अनिश्चित काल तक आवेदन पर बैठा नहीं रह सकता।”

पूर्व निर्णयों पर भरोसा कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के स्मिता मान बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी (2023) के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि पासपोर्ट मैनुअल की आवश्यकताओं को लचीले ढंग से समझा जाना चाहिए। इसने बॉम्बे हाईकोर्ट के युशिका विवेकgedam बनाम भारत संघ (2025) और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के देवयानी नितेश भारद्वाज बनाम भारत संघ (2025) के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिसमें पुष्टि की गई थी कि वैवाहिक कलह के कारण पिता के सहमति देने से इनकार करने से नाबालिग के यात्रा के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।

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निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. प्रतिवादी अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे नियमित सत्यापन औपचारिकताओं को पूरा करने के अधीन, याची के पासपोर्ट को तत्काल संसाधित और जारी करें।
  2. याची द्वारा अपनी मां के माध्यम से प्रक्रियात्मक आवश्यकताओं (विशेष रूप से अनुलग्नक-सी के संबंध में) का अनुपालन करने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर पासपोर्ट जारी किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “जहां नाबालिग का आवेदन अन्य प्रकार से ठीक है और नियमों के तहत सभी औपचारिकताएं पूरी की गई हैं, वहां पासपोर्ट देने से इनकार करने का कोई वैध कारण मौजूद नहीं है।”

केस विवरण

केस टाइटल: पोम जायसवाल बनाम भारत संघ और अन्य

केस नंबर: रिट-सी नंबर-9771 ऑफ 2025

कोरम: न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी

याची के वकील: चंद्र मोहन सिंह, राजेश कुमार, गौरव पांडे

प्रतिवादियों के वकील: ए.एस.जी.आई., संजय द्विवेदी

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