नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जिम्मेदारी लोअर कोर्ट की भी: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली—- सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि ट्रायल कोर्ट और मजिस्ट्रेट कोर्ट को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की उतनी ही जिम्मेदारी है जितनी सुप्रीम कोर्ट को

पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट जज और मजिस्ट्रेट को न सुने जाने लायक मामले को शुरू में ही निरस्त कर देना चाहिए।लोअर कोर्ट न्याय प्रणाली की रक्षा की पहली पंक्ति होते हैं।

जस्टिस मोहन एम शांतनगौदर और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की बेंच ने मेरठ में हुई मारपीट के मामले में कहा कि बेवजह मुकदमेबाजी रोजाना की नियति नही बननी चाहिए। कोर्ट को जनहित याचिका के अधिकार का दुरुपयोग व विरोधियों को परेशान करने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का जरिया नही बनना चाहिए।

पीठ ने आगे कहा कि न्याय प्रणाली को व्यक्तिगत प्रतिशोध का पूर्ण करने का उपकरण नही बनने देना चाहिए। जिस व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाया गया हो ,वह न केवल वित्तिय नुकसान झेलता है,बल्कि उसे समाज का तिरस्कार और कलंक भी झेलना पड़ता है। उसे अपना बचाव करने के लिए धन की व्यवस्था में कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है।

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