क्या पुलिस FIR दर्ज करने के लिए बाध्य है? जानिए सुप्रीम कोर्ट के मशहूर “ललिता कुमारी” निर्णय के बारे में

सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य में FIR दर्ज करने के सबंध में एक मह्त्वपूर्ण निर्णय दिया था। इस मामले में कोर्ट के सामने ये सवाल था कि

क्या पुलिस अधिकारी एक संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना प्राप्त होने पर धारा 154 दंड प्रक्रिया संहिता, 1973  में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए बाध्य है? 

या 

पुलिस अधिकारी के पास ऐसी जानकारी दर्ज करने से पहले उसकी सत्यता का परीक्षण करने के लिए “प्रारंभिक जांच” करने की शक्ति है?

मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा कैसे?

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक लड़की ललिता कुमारी (नाबालिग) द्वारा अपने पिता, श्री भोला कामत के माध्यम से बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) रिट दायर की गई। इस रिट में वादी ने अपनी नाबालिग बेटी, जिसका अपहरण कर लिया गया था की सुरक्षा के लिए याचना कि थी । उक्त रिट याचिका में शिकायत यह थी कि याचिकाकर्ता द्वारा दिनांक 11.05.2008 को संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी के समक्ष एक लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई, जिसने उस पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके बाद जब पुलिस अधीक्षक को स्थानांतरित किया गया, तो प्राथमिकी दर्ज की गई। याचिकाकर्ता के मुताबिक उसके बाद भी न तो आरोपी को पकड़ने के लिए और न ही नाबालिग बच्ची की बरामदगी के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।

इससे पहले ललिता कुमारी द्वारा दायर एक और याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को निर्देशित किया था कि संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना प्राप्त होने पर तुरंत FIR  दर्ज की जाए और उसकी प्रति शिकायतकर्ता को भी दी जाये। FIR दर्ज न होने कि स्थिति में शिकायतकर्ता मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन कर सकता है।

परन्तु उक्त आदेश के बाद ललिता कुमारी के पिता की FIR तो दर्ज हो गयी, परन्तु आगे कोई कार्यवाही नहीं की गयी जिसके कारण दूसरी याचिका दायर की गयी। इस याचिका में एक ओर सुप्रीम कोर्ट के हरियाणा राज्य बनाम भजनलाल, रमेश कुमारी बनाम दिल्ली एवं प्रकाश सिंह बदल बनाम पंजाब के निर्णय के आधार पे बहस की गई कि सूचना मिलने पर पुलिस FIR  दर्ज करने के लिए बाध्य है और दूसरी तरफ से ये कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के ही पी सिराजुद्दीन बनाम मद्रास राज्य, सेवी बनाम तमिलनाडु तथा शशि कांत बनाम सीबीआई में ये निर्णय दिया गया है कि FIR  दर्ज करने से पहले पुलिस अधिकारी प्रारंभिक जांच कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के ही उक्त विरोधाभास निर्णयों के आधार पर ये मामला पांच जजों कि बड़ी बेंच के सामने भेजा गया।

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सुप्रीम कोर्ट ने बनाये दो बिंदु

इस मामले कि सुनवाई 5 जजों के पीठ ने की जिसमे जस्टिस पी सथाशिवम, जस्टिस बी एस चौहान, जस्टिस  रंजना प्रकाश देसाई, जस्टिस रंजन गोगोई, एवं जस्टिस एसए बोबडे थे।सुनवाई के दौरान कोर्ट ने निम्न दो बिंदु बनाये:

(i) क्या प्राथमिकी के तत्काल गैर-पंजीकरण से पुलिस द्वारा हेराफेरी की गुंजाइश बनती है जिससे पीड़ित/शिकायतकर्ता के आरोपों की तत्काल जांच करने का अधिकार प्रभावित होता है; तथा

(ii) क्या ऐसे मामलों में जहां शिकायत/सूचना स्पष्ट रूप से संज्ञेय अपराध के किए जाने का खुलासा नहीं करती है, लेकिन प्राथमिकी अनिवार्य रूप से दर्ज की गई है, तो क्या यह किसी आरोपी के अधिकारों का उल्लंघन करती है।

पीठ ने कहा कि एफआईआर हमारे देश की आपराधिक कानून प्रक्रिया में एक प्रासंगिक दस्तावेज है और मुखबिर के दृष्टिकोण से इसका मुख्य उद्देश्य आपराधिक कानून को गति देना है और जांच अधिकारियों के दृष्टिकोण से इसके बारे में जानकारी प्राप्त करना है ताकि दोषियों का पता लगाने और उनके खिलाफ मामला दर्ज करने के लिए उपयुक्त कदम उठाए जा सकें।

कोर्ट ने CrPC की धरा 154 के इतिहास को देखने के बाद कहा की क्यूंकि धारा 154 में “Shall” शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए अगर पुलिस अधिकारी को यदि किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली कोई सूचना प्राप्त होती है, तो उक्त पुलिस अधिकारी के पास उसके सार को निर्धारित प्रपत्र में दर्ज करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है, अर्थात FIR दर्ज करनी ही होगी।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि एफआईआर बुक या एफआईआर रजिस्टर नामक किताब में एफआईआर दर्ज करना होता है। बेशक, इसके अलावा, संबंधित राज्य के प्रावधानों के तहत संबंधित पुलिस अधिनियम या नियमों, जैसा भी मामला हो, में अनिवार्य रूप से सामान्य डायरी में प्राथमिकी या प्राथमिकी के सार का उल्लेख एक साथ किया जा सकता है।

सूचना

पीठ ने लल्लन चौधरी औऱ रमेश कुमारी के निर्णय के आधार पर ये भी कहा कि संहिता की धारा 154 का अधिदेश यह है कि किसी संज्ञेय अपराध का खुलासा करने वाली जानकारी के आधार पर अपराध या मामला दर्ज करने के चरण में, संबंधित पुलिस अधिकारी इस बात की जांच शुरू नहीं कर सकता है कि क्या सूचना सही या मुखबिर विश्वसनीय और वास्तविक है या नहीं। दूसरे शब्दों में, जानकारी की वास्तविकता और विश्वसनीयता संहिता की धारा 154 के तहत मामला दर्ज करने के लिए कोई मिसाल नहीं है।

FIR दर्ज होने के मतलब अभियुक्त कि गिरफ़्तारी नहीं

प्रारंभिक जांच के समर्थन में उठाया गया तर्क यह था कि प्राथमिकी दर्ज करने से गिरफ्तारी में मनमानी होगी, जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा। इस पर कोर्ट ने कहा कि:

प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है परन्तु प्राथमिकी दर्ज करने के तुरंत बाद आरोपी की गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं है। वास्तव में, प्राथमिकी दर्ज करना और आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी कानून के तहत दो पूरी तरह से अलग अवधारणाएं हैं, और गिरफ्तारी के खिलाफ कई सुरक्षा उपाय उपलब्ध हैं। 

कोर्ट ने आगे कहा कि एक आरोपी व्यक्ति को भी संहिता की धारा 438 के प्रावधानों के तहत “अग्रिम जमानत” के लिए आवेदन करने का अधिकार है यदि उसमें उल्लिखित शर्तें पूरी होती हैं। इस प्रकार, उपयुक्त मामलों में, वह न्यायालय से आदेश प्राप्त करके उस प्रावधान के तहत गिरफ्तारी से बच सकता है।

कोर्ट ने जोगिन्दर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चूका है कि पुलिस द्वारा रूटीन तरीके से गिरफ्तारी नहीं की जा सकती।

अपवाद 

हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि  संहिता की धारा 154 सभी संज्ञेय अपराधों की सूचना कि प्राप्ति पर प्राथमिकी के अनिवार्य पंजीकरण को निर्धारित करती है, फिर भी, ऐसे अपवाद हो सकते हैं जहां अपराधों की उत्पत्ति और नवीनता में परिवर्तन के कारण प्रारंभिक जांच की आवश्यकता हो सकती है। 

डॉक्टरों के मामले में 

ऐसा ही एक उदाहरण डॉक्टरों की ओर से चिकित्सकीय लापरवाही से संबंधित आरोपों के मामले में है।कोर्ट ने कहा केवल शिकायत में आरोपों के आधार पर एक चिकित्सा पेशेवर पर मुकदमा चलाना अनुचित और असमान होगा।

इसके लिए कुछ दिशानिर्देशों को शामिल करते हुए वैधानिक नियम या कार्यकारी निर्देश भारत सरकार और / या राज्य सरकारों द्वारा भारतीय चिकित्सा परिषद के परामर्श से तैयार और जारी किए जाने की आवश्यकता है औऱ  जब तक ऐसा नहीं किया जाता है, कोर्ट ने भविष्य के लिए कुछ दिशानिर्देश निर्धारित किये:

  1. कोर्ट ने कहा कि एक निजी शिकायत पर तब तक विचार नहीं किया जा सकता जब तक कि शिकायतकर्ता ने आरोपी डॉक्टर की ओर से लापरवाही या लापरवाही के आरोप का समर्थन करने के लिए किसी अन्य सक्षम डॉक्टर द्वारा दी गई विश्वसनीय राय के रूप में अदालत के समक्ष प्रथम दृष्टया सबूत पेश नहीं किया हो। 
  2. जांच अधिकारी को, लापरवाही या लापरवाही के कार्य या चूक के आरोपी डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले, सरकारी सेवा में एक डॉक्टर से एक स्वतंत्र और सक्षम चिकित्सा राय प्राप्त करनी चाहिए, जो चिकित्सा पद्धति की उस शाखा में योग्य हो।
  3. लापरवाही या लापरवाही के आरोपी डॉक्टर को नियमित तरीके से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है (सिर्फ इसलिए कि उसके खिलाफ आरोप लगाया गया है)। 
  4. जब तक जांच को आगे बढ़ाने के लिए या सबूत इकट्ठा करने के लिए उसकी गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है या जब तक जांच अधिकारी संतुष्ट नहीं होता है कि डॉक्टर के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए खुद को अभियोजन का सामना करने के लिए उपलब्ध नहीं कराया जाएगा, तब तक के लिए  गिरफ्तारी को रोका जा सकता है।

भ्रष्टाचार के मामले 

भ्रष्टाचार से संबंधित अपराधों के संदर्भ में, पी. सिराजुद्दीन के निर्णय का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि लोक सेवकों के खिलाफ कार्यवाही करने से पहले एक प्रारंभिक जांच की आवश्यकता होती है।

वैवाहिक विवाद/पारिवारिक विवाद

वैवाहिक और पारिवारिक विवादों के मामले में, पुलिस पहले प्राथमिकी दर्ज किए बिना प्रारंभिक जांच कर सकती है, क्योंकि ज्यादातर मामलों में यह गुस्से और लड़ाई का परिणाम होता है।

वाणिज्यिक अपराध

वाणिज्यिक गतिविधि या अन्य आर्थिक अपराधों के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की जा सकती है।

निष्कर्ष

यदि सूचना संज्ञेय अपराध का खुलासा करती है और तो ऐसी स्थिति में कोई प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं है, औऱ धारा 154 के तहत प्राथमिकी का पंजीकरण अनिवार्य है।

यदि प्राप्त जानकारी संज्ञेय अपराध का खुलासा नहीं करती है, लेकिन जांच की आवश्यकता को इंगित करती है, तो प्रारंभिक जांच केवल यह पता लगाने के लिए की जा सकती है कि संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ है या नहीं।

iii) यदि जांच में संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, तो प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए। ऐसे मामलों में जहां शिकायत समाप्त की जानी है, ऐसे में इसकी जानकारी शिकायतकर्ता को एक सप्ताह के अंदर दी जानी चाहिए। 

iv) संज्ञेय अपराध का खुलासा होने पर पुलिस अधिकारी अपराध दर्ज करने के अपने कर्तव्य से नहीं बच सकता। यदि ऐसा होता है तो दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए ।

v) प्रारंभिक जांच का दायरा प्राप्त जानकारी की सत्यता या अन्यथा सत्यापित करना नहीं है, बल्कि केवल यह पता लगाना है कि क्या जानकारी से किसी संज्ञेय अपराध का पता चलता है या नहीं।

vi) किस प्रकार और किन मामलों में प्रारंभिक जांच की जानी है, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। जिन मामलों में प्रारंभिक जांच की जा सकती है, वे इस प्रकार हैं:

a) वैवाहिक विवाद/पारिवारिक विवाद

बी) वाणिज्यिक अपराध

ग) चिकित्सा लापरवाही के मामले

घ) भ्रष्टाचार के मामले

e) ऐसे मामले जहां शिकायत करने में असामान्य देरी है, उदाहरण के लिए, देरी के कारणों को संतोषजनक ढंग से बताए बिना मामले की रिपोर्ट करने में 3 महीने से अधिक की देरी।

पूर्वोक्त केवल उदाहरण हैं ।

vii) अभियुक्त और शिकायतकर्ता के अधिकारों को सुनिश्चित और संरक्षित करते समय, प्रारंभिक जांच समयबद्ध की जानी चाहिए और किसी भी मामले में यह 7 दिनों से अधिक नहीं होनी चाहिए। इस तरह की देरी का तथ्य और इसके कारण सामान्य डायरी प्रविष्टि में परिलक्षित होना चाहिए।

viii) चूंकि सामान्य डायरी/स्टेशन डायरी/दैनिक डायरी पुलिस थाने में प्राप्त सभी सूचनाओं का रिकॉर्ड है, इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि संज्ञेय अपराधों से संबंधित सभी जानकारी, चाहे वह प्राथमिकी दर्ज करने के परिणामस्वरूप हो या जांच की ओर ले जा रही हो, अनिवार्य रूप से दर्ज होनी चाहिए और प्रारंभिक जांच करने का निर्णय भी ऊपर वर्णित अनुसार परिलक्षित होना चाहिए।

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रजत राजन सिंह
अधिवक्ता, इलाहाबाद उच्च न्यायलय, लखनऊ पीठ

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