केरल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से की वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 के खिलाफ याचिकाओं में पक्षकार बनने की अनुमति की मांग

केरल सरकार ने वक़्फ़ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के समूह में हस्तक्षेप के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। सरकार ने अपनी अर्जी में इस संशोधन को मूल वक़्फ़ अधिनियम, 1995 के दायरे और उद्देश्य से भटका हुआ बताया है और कहा है कि इससे राज्य की मुस्लिम आबादी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

हस्तक्षेप याचिका में राज्य ने कहा है कि केरल में मुस्लिम समुदाय के पास बड़ी संख्या में वक़्फ़ संपत्तियाँ हैं, और उन्हें यह “वास्तविक आशंका” है कि यह संशोधन उन संपत्तियों की कानूनी प्रकृति को बदल देगा और धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने के उनके संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करेगा। याचिका में कहा गया, “केरल के मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय को धार्मिक मामलों और वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन के अधिकारों में भेदभाव किए जाने की जो आशंका है, वह वास्तविक है।” सरकार ने संशोधन अधिनियम की कई धाराओं को “अत्यंत अन्यायपूर्ण” और “संविधान के अनुरूप न होने की संभावना” वाला बताया है।

मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की सेवानिवृत्ति के बाद मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ इस मामले की सुनवाई मंगलवार को करेगी। याचिकाओं में संविधान के अनुच्छेद 25 और 26—जो धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थाओं के प्रबंधन के अधिकार की गारंटी देते हैं—के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

केंद्र सरकार ने 25 अप्रैल को अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में 1,332 पन्नों का विस्तृत हलफनामा दाखिल कर संशोधन का बचाव किया है। केंद्र ने किसी भी प्रकार की “कंबल स्थगन” का विरोध करते हुए कहा है कि यह कानून संसद द्वारा पारित और राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर “संवैधानिकता की मान्यता” के साथ लागू हुआ है।

केंद्र ने विवाद को कुछ धाराओं को लेकर “झूठे और भ्रामक नैरेटिव” का नतीजा बताया और सुप्रीम कोर्ट से याचिकाओं को पूरी तरह खारिज करने की अपील की।

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा केरल सरकार को हस्तक्षेप की अनुमति देने का निर्णय इस लंबित मुकदमे पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है, खासकर तब जब अन्य राज्यों और धार्मिक संगठनों की भी इस मामले पर पैनी निगाहें हैं।

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