केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गुस्से या आवेश में आकर कहे गए शब्द भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत ‘उकसावे’ (Instigation) की श्रेणी में नहीं आते हैं। अदालत ने कासरगोड के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के आदेश को रद्द करते हुए आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी को आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया है।
न्यायमूर्ति सी. प्रदीप कुमार की पीठ ने पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को स्वीकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा कथित तौर पर कहे गए शब्द “जाओ और मर जाओ” (Go away and die) के पीछे धारा 306 के तहत अपराध गठित करने के लिए आवश्यक ‘आपराधिक मनःस्थिति’ (Mens Rea) का अभाव था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मेलपरंबा पुलिस स्टेशन के अपराध संख्या 577/2023 से जुड़ा है, जिसे बाद में अतिरिक्त सत्र न्यायालय-I, कासरगोड के समक्ष एस.सी. संख्या 427/2024 के रूप में दर्ज किया गया था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि याचिकाकर्ता (आरोपी संख्या 1) का मृतक महिला (आरोपी संख्या 2) के साथ विवाहेतर संबंध था, जो पहले से ही किसी अन्य व्यक्ति से विवाहित थी।
अभियोजन के अनुसार, विवाद तब उत्पन्न हुआ जब मृतक महिला को पता चला कि याचिकाकर्ता किसी अन्य महिला से शादी करने की योजना बना रहा है। जब उसने इस निर्णय के बारे में पूछताछ की, तो दोनों के बीच तीखी बहस हुई। आरोप है कि इस झगड़े के दौरान गुस्से में आकर याचिकाकर्ता ने महिला को डांटा और कहा, “जाओ और मर जाओ”।
इस घटना के बाद, 15 सितंबर 2023 को सुबह 5:10 से 6:00 बजे के बीच, मृतक महिला ने कथित तौर पर मानसिक रूप से परेशान होकर अपनी साढ़े पांच साल की बेटी के साथ कुएं में कूदकर आत्महत्या कर ली।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 8 जुलाई 2025 को याचिकाकर्ता की आरोप मुक्ति (Discharge) की अर्जी खारिज कर दी थी और IPC की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 204 (साक्ष्य मिटाना) के तहत आरोप तय करने का निर्णय लिया था। याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 438 और 442 के तहत हाईकोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी।
पक्षकारों की दलीलें
पुनरीक्षण याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों को सच भी मान लिया जाए, तो भी वे IPC की धारा 306 और 204 के तहत अपराध का गठन नहीं करते हैं। उन्होंने दलील दी कि यह टिप्पणी आवेश में की गई थी और इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई इरादा नहीं था।
वहीं, लोक अभियोजक (Public Prosecutor) ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के आचरण के कारण ही मृतक की मृत्यु हुई।
न्यायालय का विश्लेषण
न्यायमूर्ति सी. प्रदीप कुमार ने IPC की धारा 107 के तहत ‘दुष्प्रेरण’ (Abetment) की परिभाषा का विश्लेषण किया, जिसमें किसी अपराध को करने के लिए उकसाना, साजिश रचना या जानबूझकर सहायता करना शामिल है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संजू उर्फ संजय सिंह सेंगर बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2002) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:
“….भले ही हम अभियोजन की इस कहानी को स्वीकार कर लें कि अपीलकर्ता ने मृतक से ‘जाओ और मर जाओ’ कहा था, तो भी यह अपने आप में ‘उकसावे’ का घटक नहीं बनता है। ‘उकसाने’ शब्द का अर्थ है किसी कठोर या अनुचित कार्य को करने के लिए उत्तेजित करना या प्रेरित करना। इसलिए, उकसावे के साथ ‘मेन्स रिया’ (आपराधिक इरादा) का होना आवश्यक है। यह सामान्य ज्ञान है कि झगड़े में या क्षणिक आवेश में बोले गए शब्दों को आपराधिक इरादे से बोला गया नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने स्वामी प्रह्लाददास बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1995) के मामले पर भी भरोसा जताया, जिसमें यह निर्धारित किया गया था कि झगड़ते लोगों के बीच गर्मी में बोले गए आकस्मिक शब्द आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आते।
इसके अलावा, पीठ ने केरल हाईकोर्ट के स्वयं के निर्णय सिरियाक बनाम एस.आई. ऑफ पुलिस (2005) का उल्लेख किया, जिसमें आरोपी के इरादे को सर्वोपरि बताया गया था। अदालत ने उद्धृत किया:
“महत्वपूर्ण यह नहीं है कि मृतक ने क्या ‘महसूस’ किया, बल्कि यह है कि आरोपी का अपने कृत्य से क्या ‘इरादा’ था। बेशक, मृतक की कमजोर मानसिकता जिसने उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया, वह भी प्रासंगिक हो सकती है, लेकिन यह केवल आरोपी के आवश्यक इरादे को स्थापित करने के बाद ही देखा जाएगा।”
इन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले के तथ्यों पर लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“मौजूदा मामले में भी, याचिकाकर्ता द्वारा कहे गए शब्द ‘जाओ और मर जाओ’ याचिकाकर्ता और मृतक के बीच हुए शब्दिक झगड़े के बीच, आवेश में कहे गए थे, बिना किसी ऐसे इरादे के कि मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया जाए। इस प्रकार, IPC की धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनता है।”
अदालत ने यह भी नोट किया कि चूंकि आरोप धारा 306 के तहत अपराध नहीं बनते, इसलिए धारा 204 के तहत अपराध भी आकर्षित नहीं होगा।
फैसला
केरल हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए सत्र न्यायाधीश के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने BNSS की धारा 438 और 442 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता को IPC की धारा 306 और 204 के तहत दंडनीय अपराधों से आरोप मुक्त (Discharge) कर दिया।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: सफवान अधुर बनाम केरल राज्य
- मामला संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण याचिका संख्या 1224 वर्ष 2025 (Crl.Rev.Pet No. 1224 of 2025)
- पीठ: न्यायमूर्ति सी. प्रदीप कुमार
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री आर. अनस मुहम्मद शमनाद, श्री सी.सी. अनूप, श्री सलीक सी.ए., श्री तारीक टी.एस., श्री हमदान मंसूर के.
- प्रतिवादी के वकील: वरिष्ठ लोक अभियोजक श्री ए. विपिन नारायण

