हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में बेटे को प्राप्त संपत्ति ‘व्यक्तिगत’ है, ‘को-पार्सेनरी’ नहीं: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के लागू होने के बाद किसी हिंदू पुरुष की स्व-अर्जित संपत्ति, जो उसके बेटे को क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में प्राप्त होती है, वह बेटे की व्यक्तिगत संपत्ति मानी जाएगी। न्यायालय के अनुसार, ऐसी संपत्ति में बेटे की अपनी संतानों का कोई जन्मजात (को-पार्सेनरी) अधिकार नहीं होगा।

न्यायमूर्ति ईश्वरन एस. की एकल पीठ ने यह फैसला अतिरिक्त प्रतिवादियों (अपीलकर्ता) द्वारा दायर एक नियमित दूसरी अपील (RSA No. 245 of 2016) को स्वीकार करते हुए सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिसमें संपत्ति को ‘को-पार्सेनरी’ (सह-दायिक) प्रकृति का माना गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद 46 सेंट भूमि को लेकर था। मूल रूप से यह संपत्ति वेन्किटन एम्ब्रानथिरी ने 1925 में एक बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से खरीदी थी। उनकी मृत्यु के बाद, उनके बच्चों के बीच 1 फरवरी, 1967 को एक विभाजन विलेख निष्पादित हुआ, जिसमें उनके एक बेटे, टी.वी. रामचंद्र राव को 37 सेंट भूमि मिली। बाद में राव ने अपनी बहन से 9 सेंट अतिरिक्त भूमि प्राप्त की, जिससे उनके पास कुल 46 सेंट भूमि हो गई।

15 अप्रैल, 1978 को रामचंद्र राव ने यह पूरी भूमि अपनी पत्नी को उपहार (Gift) में दे दी। इसके बाद उनकी पत्नी ने एक वसीयत के जरिए यह संपत्ति प्रतिवादी संख्या 2 से 6 के नाम कर दी। रामचंद्र राव के बेटे (वादी) ने बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया और तर्क दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 लागू होते समय वह अपनी मां के गर्भ में था, इसलिए उसे इस संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त है और उसके पिता द्वारा मां को दिया गया ‘गिफ्ट डीड’ अवैध है।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (प्रतिवादी): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. रमेश बाबू ने तर्क दिया कि यह संपत्ति वेन्किटन एम्ब्रानथिरी की स्व-अर्जित संपत्ति थी। मिताक्षरा कानून के तहत, पोता अपने दादा की स्व-अर्जित संपत्ति में जन्म से अधिकार का दावा नहीं कर सकता। उन्होंने दलील दी कि रामचंद्र राव के हाथों में यह संपत्ति व्यक्तिगत थी न कि पैतृक।

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वादी (उत्तरदाता): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एस. श्रीकुमार ने तर्क दिया कि जैसे ही वादी का जन्म हुआ, उसके और उसके पिता के बीच एक ‘को-पार्सेनरी’ बन गई। उन्होंने ‘पुनरुद्धार’ (Revival) के सिद्धांत का सहारा लेते हुए कहा कि अधिनियम की धारा 6 के तहत संपत्ति का हस्तांतरण उत्तरजीविता (Survivorship) से होना चाहिए, न कि उत्तराधिकार से।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने माना कि विवाद इस बात पर टिका है कि क्या वादी को अपने पिता की संपत्ति में कोई जन्मजात अधिकार था। न्यायालय ने पाया कि वेन्किटन एम्ब्रानथिरी ने यह जमीन खुद खरीदी थी। मुल्ला ऑन हिंदू लॉ का हवाला देते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की:

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“को-पार्सेनरी का कोई अन्य सदस्य, यहां तक कि उसकी पुरुष संतान भी, इसमें जन्म से कोई हित प्राप्त नहीं करती है। वह इसे बेच सकता है, या उपहार में दे सकता है… उसकी मृत्यु पर यह उत्तराधिकार (Succession) के माध्यम से उसके वारिसों के पास जाती है, न कि उत्तरजीविता (Survivorship) के माध्यम से।”

न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध मामले सी.एन. अरुणाचल मुदलियार बनाम सी.ए. मुरुगनाथ मुदलियार [(1953) 2 SCC 362] का उल्लेख करते हुए कहा कि एक पिता को अपनी स्व-अर्जित संपत्ति पर पूर्ण अधिकार होता है। न्यायालय ने कहा:

“हमारी राय में यह मानना संभव नहीं है कि बेटे को वसीयत या उपहार में दी गई ऐसी संपत्ति अनिवार्य रूप से पैतृक संपत्ति मानी जाएगी, जिसमें उसके बेटों का भी समान हित होगा।”

न्यायालय ने आगे कहा कि चूंकि दादा की संपत्ति स्व-अर्जित थी, इसलिए उनके बेटों के लिए वह ‘को-पार्सेनरी’ संपत्ति नहीं बनी। 1967 के बंटवारे में जब रामचंद्र राव को हिस्सा मिला, तो वह उनकी व्यक्तिगत क्षमता में था। इसके अलावा, न्यायालय ने वादी के आचरण पर भी सवाल उठाया, क्योंकि उसने खुद अपनी मां के मालिकाना हक को स्वीकार करते हुए उस संपत्ति पर बैंक से ऋण लिया था।

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न्यायालय का निर्णय

केरल हाईकोर्ट ने कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर अपीलकर्ताओं के पक्ष में दिया:

“हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के प्रारंभ होने के बाद एक हिंदू पुरुष की मृत्यु पर क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में उसके बेटे के हाथों में आने वाली स्व-अर्जित संपत्ति उसकी व्यक्तिगत क्षमता में होती है, न कि उसके बच्चों के साथ एक को-पार्सेनरी के रूप में।”

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालतों ने संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति मानकर “गंभीर भूल” की थी। न्यायालय ने बंटवारे के आदेश को खारिज करते हुए अपील स्वीकार कर ली।

केस विवरण (Case Details):

  • केस का नाम (Case Title): संथा और अन्य बनाम राघवेन्द्रन और अन्य (Santha & Ors. v. Raghavendran & Ors.)
  • केस संख्या (Case Number): RSA No. 245 of 2016
  • पीठ (Bench): न्यायमूर्ति ईश्वरन एस. (Justice Easwaran S.)

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