अगर नियमों में ‘रेगुलर कोर्स’ लिखा है, तो ‘डिस्टेंस डिग्री’ मान्य नहीं होगी: केरल हाईकोर्ट का अहम फैसला

क्या सरकारी नौकरी के लिए डिस्टेंस एजुकेशन (दूरस्थ शिक्षा) की डिग्री रेगुलर डिग्री के बराबर मानी जा सकती है? यह सवाल अक्सर अदालतों के सामने आता है। केरल हाईकोर्ट ने अब एक महत्वपूर्ण फैसले में स्थिति स्पष्ट कर दी है। कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी भर्ती की अधिसूचना और विशेष नियमों में यह साफ लिखा है कि योग्यता ‘रेगुलर कोर्स’ (नियमित पाठ्यक्रम) के जरिए प्राप्त होनी चाहिए, तो वहां डिस्टेंस एजुकेशन की डिग्री मान्य नहीं होगी।

केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस. शामिल थे, ने केरल लोक सेवा आयोग (KPSC) द्वारा दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने केरल प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (KAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें डिस्टेंस एजुकेशन की डिग्री वाले उम्मीदवारों को रैंक लिस्ट में शामिल करने का निर्देश दिया गया था।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद ‘लाइब्रेरियन ग्रेड-IV’ की भर्ती से जुड़ा है। केरल लोक सेवा आयोग (KPSC) ने केरल म्यूनिसिपल कॉमन सर्विसेज और केरल कॉमन पूल लाइब्रेरी विभाग में इस पद के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। 31 दिसंबर 2020 और 30 नवंबर 2022 को जारी इन अधिसूचनाओं में एक बहुत ही महत्वपूर्ण नोट था।

क्लॉज (7) के तहत नोट में स्पष्ट लिखा था:

“सीधी भर्ती के लिए प्रस्तावित योग्यता केरल के किसी भी विश्वविद्यालय से ‘रेगुलर कोर्स ऑफ स्टडी’ (नियमित पाठ्यक्रम) के बाद हासिल की गई होनी चाहिए, या केरल के किसी विश्वविद्यालय द्वारा इसके समकक्ष मान्यता प्राप्त होनी चाहिए।”

कई उम्मीदवारों ने इन पदों के लिए आवेदन किया, जिनके पास केरल विश्वविद्यालय या इग्नू (IGNOU) जैसी जगहों से ‘डिस्टेंस एजुकेशन’ के जरिए प्राप्त ‘बैचलर ऑफ लाइब्रेरी एंड इंफॉर्मेशन साइंस’ (BLISc) की डिग्री थी। शुरुआत में उन्हें शॉर्टलिस्ट किया गया, लेकिन बाद में KPSC ने उनकी उम्मीदवारी यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनकी डिग्री ‘रेगुलर कोर्स’ के जरिए नहीं ली गई है।

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KPSC के इस फैसले से नाराज होकर उम्मीदवार केरल प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (KAT) पहुंच गए। उन्होंने दलील दी कि सरकार और विश्वविद्यालयों ने डिस्टेंस एजुकेशन को रेगुलर कोर्स के ‘समकक्ष’ माना है। उन्होंने 2017 के एक सरकारी आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें केरल यूनिवर्सिटी के डिस्टेंस BLISc कोर्स को रेगुलर कोर्स के बराबर घोषित किया गया था। ट्रिब्यूनल ने उम्मीदवारों की दलील मानी और उन्हें योग्य करार दिया। इसके बाद KPSC ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट में दलीले और फैसला

हाईकोर्ट में KPSC की ओर से पेश वकील श्री पी.सी. शशिधरन ने तर्क दिया कि जब नियम खुद ‘रेगुलर स्टडी’ की मांग कर रहे हैं, तो महज ‘समकक्षता’ (Equivalency) का प्रमाण पत्र काफी नहीं है। उन्होंने कहा कि समकक्षता का नियम उन लोगों पर लागू होता है जिन्होंने राज्य के बाहर से रेगुलर कोर्स किया हो, न कि उन पर जिन्होंने डिस्टेंस मोड से डिग्री ली है।

दूसरी ओर, उम्मीदवारों के वकील श्री कलाम पाशा ने तर्क दिया कि जब यूनिवर्सिटी और सरकार ने डिग्री को समकक्ष मान लिया है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट का निष्कर्ष: “नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि मुख्य मुद्दा अधिसूचना में लिखे ‘नोट’ की व्याख्या का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रोजगारदाता (राज्य) को नौकरी की प्रकृति के आधार पर योग्यता तय करने का अधिकार है।

बेंच ने शाइन बोस बी. बनाम केरल लोक सेवा आयोग (2015) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अगर नियमों में ‘रेगुलर कोर्स’ की विशिष्ट मांग को हटाकर पत्राचार (Correspondence) कोर्स को उसके बराबर मान लिया जाए, तो यह विरोधाभासी होगा। इससे ऐसी स्थिति बन जाएगी कि केरल की यूनिवर्सिटी से पास होने वालों को तो ‘रेगुलर’ पढ़ना पड़ेगा, लेकिन बाहर से डिग्री लाने वाले बिना रेगुलर क्लास किए ही नौकरी के हकदार हो जाएंगे।

कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:

“संक्षेप में, योग्यता या तो केरल की किसी यूनिवर्सिटी से रेगुलर कोर्स के जरिए होनी चाहिए, या अगर बाहर की यूनिवर्सिटी से है, तो वह भी रेगुलर कोर्स के जरिए होनी चाहिए जिसे केरल में समकक्ष मान्यता मिली हो। किसी भी सूरत में, डिस्टेंस लर्निंग के जरिए प्राप्त योग्यता को ‘रेगुलर कोर्स’ के जरिए प्राप्त डिग्री के बराबर नहीं कहा जा सकता, (जब नियम विशेष रूप से रेगुलर कोर्स की मांग करते हों)।”

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल ने नियमों की सही व्याख्या करने में बड़ी गलती की है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने KPSC की याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और ट्रिब्यूनल के आदेश को खारिज कर दिया, जिसका मतलब है कि डिस्टेंस डिग्री वाले उम्मीदवार इस विशिष्ट पद के लिए अयोग्य माने जाएंगे।

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केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: केरल लोक सेवा आयोग और अन्य बनाम मशीका सलाम और अन्य (तथा अन्य संबंधित मामले)
  • केस नंबर: OP (KAT) Nos. 379, 400, 429, 434, 436, 439, 441, और 456 of 2025
  • कोरम: जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्ण एस.
  • याचिकाकर्ता (KPSC) के वकील: श्री पी.सी. शशिधरन
  • प्रतिवादी (उम्मीदवार) के वकील: श्री कलाम पाशा बी., श्रीमती विशाखा जे., श्रीमती हसना अशरफ टी.ए., श्री आनंदु यू.आर.

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