केरल हाईकोर्ट ने मंगलवार को एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई स्वीकार की जिसमें राज्य सरकार पर आगामी विधानसभा चुनावों से पहले एक सरकारी सर्वेक्षण के नाम पर सार्वजनिक धन और सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सौमेन सेन और न्यायमूर्ति श्याम कुमार वी एम की खंडपीठ ने राज्य सरकार को 21 जनवरी तक अपना पक्ष रखने का समय दिया है। यह याचिका केएसयू (KSU) के राज्य अध्यक्ष अलोशियस जेवियर ने अधिवक्ता टिसी रोज़ के चेरियन के माध्यम से दाखिल की है।
यह जनहित याचिका ‘नव केरल सिटिजन रिस्पॉन्स प्रोग्राम’ को चुनौती देती है, जो एक डोर-टू-डोर सर्वेक्षण है और 1 जनवरी से शुरू होकर 28 फरवरी तक चलना प्रस्तावित है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह कार्यक्रम प्रशासनिक कवच में छिपा एक “पक्षपातपूर्ण राजनीतिक अभियान” है।
याचिका में दावा किया गया है कि इस सर्वे में शामिल स्वयंसेवकों में सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) के कार्यकर्ता और समर्थक शामिल किए गए हैं, जिससे यह एक सरकारी संसाधनों द्वारा वित्तपोषित “राजनीतिक संपर्क और घोषणापत्र निर्माण अभियान” बन गया है।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया है कि राज्य सरकार पहले ही 2021 से 2025 के बीच एक चार वर्षीय सर्वे पूरा कर चुकी है, जिसमें प्रत्येक घर की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन कर डाटा डिजिटाइज किया गया है। ऐसे में सरकार का कार्यकाल खत्म होने से महज़ चार महीने पहले एक नया सर्वेक्षण शुरू करना “किसी वास्तविक प्रशासनिक आवश्यकता से रहित” है।
याचिका में हाईकोर्ट से निम्नलिखित निर्देश मांगे गए हैं—
- सरकार इस सर्वेक्षण की विस्तृत योजना और वित्तीय प्रावधानों का खुलासा करे।
- अंतिम निर्णय आने तक सर्वेक्षण पर रोक लगाई जाए और इसके लिए कोई धनराशि जारी न की जाए।
- इस कार्यक्रम की निगरानी अदालत करे और यह सुनिश्चित हो कि राज्य के संसाधनों का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए न किया जाए।
अंतरिम राहत के रूप में याचिका में यह भी आग्रह किया गया है कि कोर्ट फिलहाल सर्वेक्षण की प्रक्रिया को रोके और इसके लिए कोई फंड जारी न किया जाए।
हाईकोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 21 जनवरी को करेगा जब राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल करेगी।

