कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 295A के तहत अपराध के लिए एफआईआर दर्ज करने या जांच शुरू करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 196 के तहत सरकार से पूर्व मंजूरी (Sanction) लेना अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने कहा कि धारा 196 CrPC के तहत वैधानिक रोक केवल न्यायालय द्वारा अपराध का “संज्ञान” (Cognizance) लेने के चरण पर लागू होती है। यह पुलिस को अपराध दर्ज करने और उसकी जांच करने की शक्तियों को बाधित नहीं करती है।
कोर्ट ने एक व्हाट्सएप ग्रुप के एडमिन द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं की अश्लील तस्वीरें प्रसारित करने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया (Prima facie) धारा 295A के तहत अपराध के सभी तत्व मौजूद हैं।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला “बजरंगी गो कल्लारू” (Bajarangi Go Kallaru) नामक एक व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के. जयराज सालियन ने आरोप लगाया कि 23 जनवरी 2021 को उन्हें एक अज्ञात स्रोत से इस ग्रुप का लिंक मिला। ग्रुप में जुड़ने पर उन्होंने पाया कि वहां 6 एडमिन और करीब 250 सदस्य थे।
आरोप है कि इस ग्रुप में हिंदू देवी-देवताओं और कुछ राजनीतिक हस्तियों की “अश्लील और अत्यंत अपमानजनक तस्वीरें” लगातार प्रसारित की जा रही थीं। शिकायतकर्ता का कहना था कि इससे उनकी धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाई गई।
इस शिकायत के आधार पर मंगलुरु की CEN (साइबर, इकोनॉमिक्स, नारकोटिक्स) पुलिस ने आईपीसी की धारा 295A और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत अपराध संख्या 4/2021 दर्ज की। याचिकाकर्ता सिराजुद्दीन, जो ग्रुप के एडमिन में से एक थे, ने एफआईआर को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
दलीलें और कोर्ट का विश्लेषण
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि धारा 196(1) CrPC के तहत सक्षम प्राधिकारी से पूर्व मंजूरी लिए बिना मजिस्ट्रेट धारा 295A के अपराध का संज्ञान नहीं ले सकते। उन्होंने यह भी कहा कि जांच अधिकारी ने इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य सुरक्षित रखने में लापरवाही बरती और केवल याचिकाकर्ता को निशाना बनाया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अतिरिक्त राज्य लोक अभियोजक (Addl. SPP) ने तर्क दिया कि मंजूरी की आवश्यकता केवल चार्जशीट दाखिल करने और कोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के समय होती है, एफआईआर दर्ज करने के समय नहीं।
हाईकोर्ट का निर्णय: “घोड़े के आगे गाड़ी रखने जैसा होगा”
जस्टिस नागप्रसन्ना ने कानून की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा:
“धारा 196 CrPC के तहत रोक स्पष्ट है। यह रोक केवल तब लागू होती है जब न्यायालय अपराध का संज्ञान लेने का प्रस्ताव करता है। यह पुलिस को एफआईआर दर्ज करने या जांच करने से नहीं रोकता। इसलिए, अपराध दर्ज करने और जांच के लिए मंजूरी प्राप्त करने का कानून में कोई प्रावधान नहीं है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के परवेज परवाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जांच पूरी होने और सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सामग्री रखे जाने के बाद ही मंजूरी का सवाल उठता है।
कोर्ट ने एक दिलचस्प टिप्पणी करते हुए कहा:
“जांच से पहले ही मंजूरी की जिद करना ‘घोड़े के आगे गाड़ी’ (cart before the horse) रखने जैसा होगा और इससे जांच करने के उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।”
धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर कोर्ट सख्त
मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए कोर्ट ने पाया कि जांच सामग्री में हिंदू देवी-देवताओं का चित्रण “असाधारण रूप से अश्लील और अपमानजनक” तरीके से किया गया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी सामग्री को न्यायिक आदेश में पुनरुत्पादित करना भी अनुचित होगा।
कोर्ट ने कहा:
“सामग्री को देखने से ही पता चलता है कि इसमें धार्मिक भावनाओं को आहत करने और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की प्रवृत्ति है। याचिकाकर्ता की मंशा (mens rea) क्या थी और उसकी भूमिका क्या थी, यह जांच का विषय है। इस स्तर पर जांच को रोकना गंभीर आरोपों की वैध जांच का गला घोंटने जैसा होगा।”
फैसला
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन साथ ही जांच अधिकारी के रवैये पर चिंता भी जताई। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने ग्रुप के सभी एडमिन के खिलाफ एक समान कार्रवाई नहीं की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि जांच में किसी अन्य सदस्य की सक्रिय भूमिका पाई जाती है, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। चूंकि मामला 2021 का है, इसलिए कोर्ट ने जांच को जल्द से जल्द पूरा करने का आदेश दिया।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: श्री सिराजुद्दीन बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 3258 ऑफ 2024
- कोरम: जस्टिस एम. नागप्रसन्ना
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री टी. रमेश
- प्रतिवादी के वकील: श्री बी.एन. जगदीश, अतिरिक्त एसपीपी (राज्य के लिए); श्री रक्षित कुमार (प्रतिवादी संख्या 2 के लिए)

