“कोर्ट को डराने की कोशिश न करें”: वकील के ‘धमकाने’ वाले व्यवहार पर कर्नाटक हाईकोर्ट सख्त; संपत्ति बंटवारे के मामले में पुनर्विचार याचिका खारिज

कर्नाटक हाईकोर्ट ने संपत्ति के बंटवारे से जुड़ी एक पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील के “अशिष्ट” और “धमकाने वाले” व्यवहार पर कड़ी आपत्ति जताई है। हाईकोर्ट ने अपने पिछले आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें वादी पक्ष के लिए संपत्ति का 1/4 हिस्सा सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ‘ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट’ (TP Act) की धारा 52 के भरोसे रहना कमजोर पक्षों के लिए जोखिम भरा हो सकता है और ऐसे में कोर्ट का फैसला महज एक “कागजी शेर” बनकर रह जाएगा।

यह आदेश जस्टिस हनचते संजीवकुमार द्वारा पुनर्विचार याचिका संख्या 587/2025 में पारित किया गया। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं पर 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया और फैसले का एक बड़ा हिस्सा वकील द्वारा बहस के दौरान किए गए आचरण की आलोचना के लिए समर्पित किया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद दिवंगत मुनियप्पा के परिवार से संबंधित है, जिनके चार बच्चे हैं: गोविंद रेड्डी (वादी), चन्नम्मा (प्रतिवादी संख्या 25), कृष्णप्पा और चन्नरैया रेड्डी। पुनर्विचार याचिका दायर करने वाले कृष्णप्पा और चन्नरैया रेड्डी के बेटे हैं।

वादी पक्ष ने संपत्ति के बंटवारे के लिए मुकदमा दायर किया था। साल 2025 में, हाईकोर्ट ने एक अपील (MFA No. 7416/2025) में निचली अदालत के आदेश में संशोधन करते हुए निर्देश दिया था कि प्रतिवादी पक्ष वादी और प्रतिवादी संख्या 25 के लिए सभी संपत्तियों में 1/4 हिस्सा सुरक्षित रखे। प्रतिवादियों को शेष हिस्से का उपयोग करने की अनुमति दी गई थी, लेकिन उन्हें फ्लैटों के निर्माण का पूरा विवरण देने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इसी आदेश के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील अरुण बी.एम. ने तर्क दिया कि:

  • वादी पक्ष ने यह तथ्य छुपाया कि चन्नम्मा ने पहले भी मुकदमा किया था और वह अंतरिम आदेश प्राप्त करने में विफल रही थीं।
  • यह मुकदमा समय सीमा (Limitation) से बाहर है क्योंकि 2013 के ‘जॉइंट डेवलपमेंट एग्रीमेंट’ (JDA) को 12 साल की देरी के बाद चुनौती दी गई है।
  • कोर्ट ने ‘मंडाली रंगन्ना बनाम टी. रामचंद्र’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार पक्षों के आचरण पर विचार नहीं किया।
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वहीं, वादी पक्ष ने दलील दी कि बंटवारे के मामले में ‘कॉज़ ऑफ एक्शन’ (कारण) निरंतर बना रहता है। उन्होंने जोर दिया कि गोविंद रेड्डी (जो बोल और सुन नहीं सकते) और चन्नम्मा (एक बुजुर्ग महिला) को उनके जायज हक से वंचित करने की कोशिश की जा रही है।

हाईकोर्ट का कानूनी विश्लेषण

जस्टिस हनचते संजीवकुमार ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी बहन और दिव्यांग भाई को जानबूझकर विकास समझौतों से बाहर रखा।

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धारा 52 (TP Act) पर कोर्ट की टिप्पणी: कोर्ट ने कहा कि यद्यपि धारा 52 लागू होती है, लेकिन बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स में यह पर्याप्त नहीं है। कोर्ट के शब्दों में:

“टी.पी. एक्ट की धारा 52 के तहत मिलने वाली सुरक्षा एक ‘कमजोर सुरक्षा’ है… यदि मुकदमे के दौरान ही सभी फ्लैट बेच दिए जाते हैं, तो भविष्य में डिग्री प्राप्त होने के बावजूद उसका फल पाना वादी पक्ष के लिए किसी बुरे सपने जैसा होगा।”

कोर्ट ने आगे कहा कि यदि हिस्सा सुरक्षित नहीं रखा गया, तो वादी पक्ष को सैकड़ों खरीदारों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी, जिससे कोर्ट का फैसला महज एक “कागजी शेर” (Paper Tiger) बनकर रह जाएगा।

वकील के आचरण पर सख्त फटकार

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ‘वकालत’ (On Advocacy) शीर्षक के तहत वकील श्री बी.एम. अरुण के व्यवहार पर गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने नोट किया कि वकील का लहजा “कोर्ट को धमकाने वाला” और “गरिमा के खिलाफ चिल्लाने वाला” था।

कोर्ट ने कहा:

“वकीलों और वादियों को न्यायाधीशों को ‘डराने’ या ‘धमकाने’ की अनुमति नहीं दी जा सकती ताकि वे अपनी मर्जी का आदेश प्राप्त कर सकें… किसी भी वकील को अनुकूल आदेश पाने के लिए कोर्ट पर हावी होने या पीठासीन अधिकारी को बदनाम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

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कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि वकील की चिल्लाने वाली बहस धारवाड़ बेंच के कोर्ट हॉल में मौजूद अधिकारियों और अन्य वकीलों ने भी देखी। हालांकि कोर्ट ने बार काउंसिल को शिकायत करने पर विचार किया, लेकिन “वकीलों के प्रति सम्मान” के कारण खुद को इस कदम से रोक लिया।

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका को “भ्रामक, तुच्छ और कष्टप्रद” करार देते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि न्याय वास्तविक और व्यावहारिक होना चाहिए, न कि केवल एक कागजी आदेश। याचिकाकर्ताओं को 25,000 रुपये की लागत (Cost) जमा करने का आदेश दिया गया है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: श्री के. गणेश और अन्य बनाम श्री गोविंद रेड्डी और अन्य
  • केस नंबर: पुनर्विचार याचिका संख्या 587/2025 (MFA No. 7416/2025 में)
  • बेंच: जस्टिस हनचते संजीवकुमार
  • आदेश की तिथि: 3 मार्च, 2026

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