जजों की ट्रेनिंग के लिए विशेष कॉलेज के सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव को केंद्र सरकार ने ठुकराया

केंद्र सरकार ने लोअर कोर्ट के जजों के लिए कैडर व्यवस्था बनाने और उनके लिए विशेष केंद्रीय प्रशिक्षण कॉलेज खोलने के सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव को दरकिनार कर दिया है। इस कॉलेज में एलएलबी की तरह न्यायाधीशों के कोर्स शुरू किए जाते और उन्हें सीधे लोअर कोर्ट में जज नियुक्त किया जाता। केंद्रीय जज प्रशिक्षण संस्थान बनाने का प्रस्ताव पिछले महीने रिटायर हुए सीजेआई एस ए बोबडे ने किया था। उनका मानना था कि लॉ कॉलेजों में जो पढ़ाया जाता है, वह छात्रों को अधिवक्ता तो बनाता है, लेकिन जज नही बनाता।

न्यायमूर्ति बोबडे का मानना था कि जजशिप एक अलग तरह की विद्या है। जिसे अलग से पढ़ाया जाना चाहिए। लॉ स्नातक अधिवक्ता जब न्यायिक परीक्षा के बाद जज बनते हैं तो उन्हें न्यायिक अकादमी में ट्रेनिंग के लिए भेजा जाता है। न्यायिक अकादमी लगभग हर प्रांत में है और संबंधित हाई कोर्ट के निर्देशन में काम करती है।

सीजेआई बोबडे मानते थे कि चयन होने के पश्चात जज को प्रशिक्षण के लिए भेजने की वजाय एक ऐसा केंद्रीय संस्थान कॉलेज हो जिसमे केवल जजों की पढ़ाई हो। जज कोर्स के लिए एंट्रेस एग्जाम हो और कोर्स करने के बाद उन्हें सीधे न्यायिक सेवा में लगाया जाए। उन्होंने पुणे स्थित आर्मी के मेडिकल कॉलेजों के उदाहरण लिया था। जिसमे 12 वीं पास छात्रों को प्रवेश परीक्षा के आधार पर एमबीबीएस की पढ़ाई कराई जाती है और उन्हें सीधे सैन्य सेवाओं में कमीशन दे दिया जाता है इसके लिए उनसे कुछ वर्षों की आवश्यक सेवा के लिए बांड भरवाया जाता है।

दरअसल भारतवर्ष की सभी लोअर कोर्ट में तकरीबन पांच हजार न्यायिक अधिकारियों की जगह रिक्त है। औऱ 2.5 लाख के आसपास केसों का बोझ है। सूत्रों के मुताबिक केंद्र सरकार को ये प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन कानून एंव न्याय मंत्रालय ने इसे न्यायिक व्यवस्था के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया और कहा कि इस पर संसद ही कोई फैसला ले सकती है। बीते माह सीजेआई बोबडे सेवानिवृत्त हो गए थे और यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया।

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