पटियाला के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) श्री हरिंदर सिद्धू की अदालत ने एक सेवारत न्यायिक अधिकारी, बिक्रमदीप सिंह की पहली अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। बिक्रमदीप सिंह पर अपने ही एक मृतक सहयोगी के घर से सोने और जेवरात चोरी करने का आरोप है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपों की गंभीरता और संपत्ति की बरामदगी की आवश्यकता को देखते हुए हिरासत में पूछताछ जरूरी है, और न्यायिक अधिकारी होने के नाते मिलने वाली विशेष सुरक्षा का तर्क इस मामले में प्रभावी नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला प्राथमिकी संख्या 56, दिनांक 21 मार्च, 2026 से संबंधित है, जो पुलिस स्टेशन डिवीजन नंबर 4 (लाहौरी गेट), पटियाला में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराओं 331(4) और 305 (जो कि IPC की धारा 457 और 380 के समकक्ष हैं) के तहत दर्ज की गई थी।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि याचिकाकर्ता ने, घर की नौकरानी और अन्य साथियों के साथ मिलकर, दिवंगत श्री कंवलजीत सिंह (अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश) के आवास से उनके निधन की रात को पुस्तैनी सोना, जेवरात और नकदी चोरी की। यह शिकायत मृतक के बेटे अंगदपाल सिंह के मुख्तार-ए-आम (Special Power of Attorney) डॉ. भूपिंदर सिंह विर्क द्वारा दर्ज कराई गई थी।
CCTV फुटेज में याचिकाकर्ता को सरकारी गनमैन के साथ मृतक के घर में बक्से और बैग लेकर प्रवेश करते और बाहर निकलते देखा गया था, जबकि उस समय घर का कोई सदस्य वहां मौजूद नहीं था।
याचिकाकर्ता के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से वकील श्री अनीश जैन और श्री अमित जैन ने दलील दी कि प्राथमिकी केवल याचिकाकर्ता की छवि खराब करने के लिए दर्ज की गई है। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:
- अनुमति का दावा: याचिकाकर्ता का कहना था कि उन्होंने मृतक के बेटे अंगदपाल सिंह के कहने पर ही घर से कीमती सामान सुरक्षित रखने के लिए उठाया था।
- दुर्भावना का अभाव: यह तर्क दिया गया कि यदि चोरी की मंशा होती, तो याचिकाकर्ता व्यक्तिगत रूप से वहां नहीं जाते और न ही गनमैन को साथ ले जाते या CCTV के DVR को वहीं छोड़ते।
- सामान सौंपना: याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उन्होंने 4 अगस्त, 2025 को अंगदपाल सिंह को सारा सामान सौंप दिया था, लेकिन पारिवारिक संबंधों के कारण कोई लिखित रसीद नहीं ली।
- न्यायिक छूट: दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य (1991) मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि न्यायिक अधिकारियों को गिरफ्तारी से सुरक्षा प्राप्त है।
अभियोजन पक्ष के तर्क
अतिरिक्त लोक अभियोजक श्री चरणजीत सिंह भुल्लर ने जमानत का विरोध करते हुए कहा:
- समय का विरोधाभास: CCTV फुटेज के अनुसार सामान रात 9:50 बजे तक हटा लिया गया था, जबकि याचिकाकर्ता के व्हाट्सएप चैट के अनुसार मृतक के बेटे से उनका पहला संपर्क रात 10:15 बजे के बाद हुआ।
- हिरासत में पूछताछ: राज्य ने दलील दी कि पूरी साजिश का पर्दाफाश करने और चोरी की गई संपत्ति बरामद करने के लिए पुलिस हिरासत में पूछताछ अनिवार्य है।
- गुमराह करना: यह आरोप भी लगाया गया कि याचिकाकर्ता ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर मृतक के बेटों को उनके पटियाला वाले घर जाने से रोका, ताकि उनकी गतिविधियों का पता न चल सके।
कोर्ट का विश्लेषण
अदालत ने जमानत के सिद्धांतों पर विचार करते हुए न्यायिक छूट के दावे पर स्पष्ट किया:
“माननीय उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन मामले में स्पष्ट किया है कि न्यायिक अधिकारियों को आपराधिक जांच या मुकदमे से पूर्ण मुक्ति नहीं मिलती। सुरक्षा के नियम गिरफ्तारी के तरीके से जुड़े हैं, न कि गिरफ्तारी से छूट से… कानून से ऊपर कोई भी व्यक्ति नहीं है, चाहे उसका पद या ओहदा कुछ भी हो, और उसे आपराधिक कानून के उल्लंघन के परिणाम भुगतने होंगे।”
जांच के तथ्यों पर कोर्ट ने पाया कि CCTV फुटेज प्रथम दृष्टया याचिकाकर्ता की उपस्थिति को संदिग्ध तरीके से दर्शाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि व्हाट्सएप चैट से यह स्पष्ट नहीं होता कि सामान ले जाने की कोई स्पष्ट अनुमति दी गई थी। हिरासत में पूछताछ के महत्व पर कोर्ट ने उच्चतम न्यायालय के C.B.I. बनाम अनिल शर्मा मामले का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को अग्रिम जमानत का संरक्षण मिलने से जांच प्रभावित हो सकती है।
निर्णय
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि संपत्ति की बड़ी मात्रा में बरामदगी और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा।
अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
केस का विवरण:
- केस का शीर्षक: बिक्रमदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य
- केस संख्या: BA-1214-2026
- अदालत: अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पटियाला (श्री हरिंदर सिद्धू)
- आदेश की तिथि: 01.04.2026

