जानिए सुप्रीम कोर्ट के अगले CJI जस्टिस एनवी रमाना का छात्र नेता से CJI तक का सफर

नई दिल्ली—- छात्र नेता से अपनी पहचान की शुरुआत करके अगले 48वें सीजेआई तक का सफर जस्टिस नथमलपति वेंकटे रमना की यात्रा उल्लेखनीय है। आंध्रप्रदेश राज्य के कृष्णा जिले के पोन्नवरम गांव में साधारण परिवार में जन्मे न्यायाधीश रमना को उनके पिता ने जून वर्ष 1975 में आपातकाल के खिलाफ एक सार्वजनिक बैठक की अध्यक्षता करने के उपरांत शहर छोड़ने के लिए कपड़ों का बैग बाँधने के लिये कह दिया था। 

जस्टिस रमना ने दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान अपने अनुभव साझा करते हुए कहा “मैंने देखा कि इतने सारे युवाओं ने मानवाधिकारों के लिए अपने जीवन का बलिदान कर दिया था। ऐसे में मुझे कॉलेज में एक साल गंवाने का कोई पक्षतावा नही है। मेरे पिता को विश्वास था कि मैं गिरफ्तार कर लिया जाऊंगा। 

1980 के दशक में जस्टिस रमना ने दो वर्षों तक एक क्षेत्रीय समाचार पत्र में पत्रकार के तौर पर काम किया। वर्ष 1983 में बार मे नामांकित किया गया था। वकील के तौर पर उन्होंने संवैधानिक,आपराधिक, सेवा अंतरराज्यीय नदी कानूनों में विशेषज्ञता हासिल की। साथ ही आंध्रा हाई कोर्ट केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण, एमपी राज्य न्यायाधिकरण और सिविल ,आपराधिक ,संवैधानिक सेवा श्रम और चुनावी मामलों में सुप्रीम कोर्ट में अभ्यास किया। 

जस्टिस रमना को 2000 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया। और वर्ष 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया। इसके उपरांत 17 फरवरी 2014 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति के रुप में पदोन्नत किया गया। 

जस्टिस रमना ने उस पीठ का नेतृत्व किया था,जिसमे पिछले वर्ष जनवरी में फैसला सुनाया था कि संविधान के आर्टिकल 370 हटाने के बाद जम्मू कश्मीर में दूरसंचार ब्लैकआउट करते हुए कहा गया कि इंटरनेट का प्रयोग मौलिक अधिकार है। पीठ ने टैब जम्मू कश्मीर प्रसाशन को आदेश दिया कि वह दूरसंचार और इंटरनेट सेवाओ पर अंकुश लगाने संबंधित सभी आदेशों की समीक्षा करें और उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में रखें। 

कश्मीर प्रतिबंधों पर याचिकाओं के समूह को मानते हुए जस्टिस रमना की पीठ ने प्रेस की स्वतंत्रता के महत्व को भी रेखांकित किया था। पीठ की ओर से कहा गया कि जिम्मेदार सरकारों को हर वक्त प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए। 

साथ ही जस्टिस रमना ने कर्नाटक विधानसभा मामले में एक और अहम फैसला सुनाया है। उन्होंने विधायकों को अयोग्य ठहराने के स्पीकर के फैसले को सही ठहराया ।सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा की इस्तीफा देने से स्पीकर के आधार खत्म नही हो जाते हैं। हालांकि अयोग्यता के मामलों में विधायकों को अपना पक्ष रखने के लिए मौका मिलना चाहिए।

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पीठ ने आयोग्य विधायकों को राहत प्रदान करते हुए उनको विधानसभा उपचुनाव लड़ने की अनुमति दी। कोर्ट ने कहा है कि विधायकों को विधानसभा के पूरे कार्यकाल के लिए आयोग्य नही ठहराया जा सकता। 

जस्टिस रमना ने निर्णय में लिखा अध्यक्षों की निष्पक्ष होने के संवैधानिक कर्तव्य के विरुद्ध कार्य करने वाली प्रवति बढ रही है। इसके अलावा घोड़ा व्यापारिक राजनीतिक दल और पक्षपातपूर्ण भाषण नागरिकों को एक स्थिर सरकार से वंचित कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में कुछ पहलुओं को मजबूत करने पर विचार करने की आवश्यकता है। ताकि इस अलोकतांत्रिक प्रथाओं को हतोत्साहित और जांच की जा सके। 

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