IBC | ‘जुड़े हुए’ रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स पर एक साथ चल सकती है इंसोल्वेंसी प्रक्रिया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट सेक्टर और इंसोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि दो अलग-अलग कंपनियां किसी एक ही प्रोजेक्ट के लिए “आंतरिक रूप से जुड़ी” (Intrinsically Linked) हैं, तो उनके खिलाफ एक संयुक्त इंसोल्वेंसी याचिका (Joint Insolvency Petition) दाखिल की जा सकती है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मैसर्स ग्रैंड वेनेज़िया कमर्शियल टावर्स प्राइवेट लिमिटेड और मैसर्स भसीन इन्फोटेक एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ इंसोल्वेंसी प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने के आदेश को सही ठहराया। कोर्ट ने बिल्डर्स की इस दलील को खारिज कर दिया कि प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है और आवंटियों को पजेशन दिया जा चुका है।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद ‘ग्रैंड वेनेज़िया कमर्शियल टावर’ नामक एक प्रोजेक्ट से जुड़ा है, जिसे भसीन इन्फोटेक ने 2005 में उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) से लीज पर ली गई जमीन पर शुरू किया था। प्रोजेक्ट में ऑफिस स्पेस बुक कराने वाले 141 आवंटियों (Financial Creditors) ने NCLT, नई दिल्ली का दरवाजा खटखटाया।

आवंटियों का आरोप था कि मई 2013 तक पजेशन देने का वादा किया गया था, लेकिन यूनिट्स अभी तक रहने लायक नहीं हैं। न तो फाइनल कंप्लीशन सर्टिफिकेट लिया गया और न ही जनवरी 2014 के बाद से ‘एश्योर्ड रिटर्न’ का भुगतान किया गया। सबसे अहम बात यह थी कि UPSIDA के साथ अनिवार्य ‘त्रिपक्षीय सब-लीज डीड’ (Tripartite Sublease Deed) भी निष्पादित नहीं की गई थी।

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4 दिसंबर, 2023 को NCLT ने याचिका स्वीकार कर ली थी, जिसे बाद में NCLAT ने भी बरकरार रखा। इसके खिलाफ कंपनियों के पूर्व निदेशकों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

बिल्डर्स की दलीलें: “हम अलग हैं और प्रोजेक्ट पूरा है”

सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि:

  1. अलग-अलग कंपनियां: भसीन इन्फोटेक (डेवलपर) और ग्रैंड वेनेज़िया (मार्केटिंग एजेंसी) दो अलग कानूनी इकाइयां हैं। उनके खिलाफ एक ही याचिका में सुनवाई नहीं हो सकती।
  2. थ्रेशोल्ड की कमी: अगर दोनों कंपनियों के आवंटियों को अलग कर दिया जाए, तो IBC की धारा 7 के तहत आवश्यक 100 आवंटियों की न्यूनतम संख्या पूरी नहीं होगी।
  3. पजेशन दिया जा चुका है: उन्होंने 2015 के एक आंशिक-पूर्णता प्रमाण पत्र (Part-completion certificate) और आवंटियों को जारी किए गए “पजेशन लेटर्स” का हवाला देते हुए दावा किया कि प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: सच्चाई कुछ और ही निकली

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गहराई से जांच की और बिल्डर्स के दावों को तथ्यात्मक रूप से गलत पाया।

1. “आंतरिक रूप से जुड़ी” कंपनियां (Intrinsically Linked) कोर्ट ने पाया कि भले ही जमीन भसीन इन्फोटेक को आवंटित थी, लेकिन 2009 में ग्रैंड वेनेज़िया को “विशेष विपणन अधिकार” दिए गए थे। कोर्ट ने उन्हें एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना क्योंकि:

  • दोनों कंपनियों में कॉमन डायरेक्टर्स थे।
  • आवंटियों को डिमांड नोटिस और रसीदें दोनों कंपनियों द्वारा अदला-बदली करके जारी की गई थीं।
  • ग्रैंड वेनेज़िया को मार्केटिंग अधिकार मिलने से ठीक एक महीने पहले ही बनाया गया था, फिर भी उसने खुद को “प्रतिष्ठित मार्केटर” बताया, जो कोर्ट को गले नहीं उतरा।
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कोर्ट ने कहा कि चूंकि ये कंपनियां संयुक्त रूप से आवंटियों के प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए एसेट की अधिकतम वसूली के लिए संयुक्त इंसोल्वेंसी प्रक्रिया ही सही है।

2. 100 आवंटियों का नियम (Threshold Limit) मनीष कुमार बनाम भारत संघ (2021) के फैसले का हवाला देते हुए, पीठ ने दोहराया कि 100 आवंटियों की संख्या याचिका दाखिल करने की तारीख पर देखी जानी चाहिए, न कि एडमिशन के समय। कोर्ट ने पाया कि 103 यूनिट्स के आवंटियों ने याचिका दायर की थी, जो वैध थी।

3. ‘कागजी पजेशन’ और अधूरी इमारत बिल्डर्स के “प्रोजेक्ट पूरा होने” के दावे की पोल ऑब्जर्वर की रिपोर्ट ने खोल दी। 15 मई, 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने बताया कि इमारत का एक बड़ा हिस्सा केवल “बेयर-शेल स्ट्रक्चर” (कंक्रीट का ढांचा) है।

  • दरवाजे, लाइटिंग और फायर सेफ्टी जैसी बुनियादी सुविधाएं गायब थीं।
  • 9वीं से 15वीं मंजिल तक कोई निर्माण नहीं हुआ था।
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कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब तक UPSIDA के साथ त्रिपक्षीय सब-लीज डीड निष्पादित नहीं होती, तब तक बिल्डर द्वारा जारी किए गए “पजेशन लेटर्स” का कोई कानूनी महत्व नहीं है। इसे कोर्ट ने “कागजी” या “नोशनल पजेशन” (Notional Possession) मानकर खारिज कर दिया।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज कर दिया और NCLT व NCLAT के आदेशों को सही ठहराया। कोर्ट ने अपीलकर्ता सतिंदर सिंह भसीन द्वारा दावों के निपटारे के लिए 15.62 करोड़ रुपये जमा करने के अंतिम प्रस्ताव को भी यह कहते हुए ठुकरा दिया कि यह प्रस्ताव इस गलत आधार पर था कि प्रोजेक्ट पूरा हो चुका है।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: सतिंदर सिंह भसीन बनाम कर्नल गौतम मल्लिक और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 13628/2025 (अन्य याचिकाओं के साथ)
  • कोरम: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

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