झारखंड हाईकोर्ट ने गुरुवार को केंद्र और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे लापता पीड़ितों, विशेषकर नाबालिगों के आधार कार्ड विवरण को ट्रेस करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करें, ताकि जांच प्रक्रिया तेज हो सके और मामलों में विलंब न हो।
मुख्य न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ यह निर्देश गुमला की निवासी चंद्रमुनी उरांव की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए दे रही थी, जिनकी छह वर्षीय बेटी वर्ष 2019 से लापता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि पुलिस ने लापता बच्ची के आधार कार्ड विवरण को ट्रेस करने के लिए आवेदन दिया है, लेकिन वह काफी समय से लंबित है। इस पर अदालत ने कहा कि “यह एक लंबी प्रक्रिया है जो मामलों की जांच में बाधा बन रही है।”
कोर्ट ने कहा कि “बच्चों के लापता होने व मानव तस्करी के मामलों में कई बार पुलिस को जानकारी नहीं दी जाती है। इसलिए एक SOP बनाना आवश्यक है जिससे पुलिस त्वरित हस्तक्षेप कर सके।”
कोर्ट ने बुधवार को दिए आदेश में आधार संबंधी जानकारी को लेकर यूआईडीएआई (UIDAI) के निदेशक को भी इस मामले में पक्षकार बनाने को कहा है, ताकि प्रक्रिया को प्रभावी रूप से आगे बढ़ाया जा सके।
इस मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को होगी।
कोर्ट को यह भी जानकारी दी गई कि इसी महीने चंद्रमुनी उरांव पर ग्रामीणों ने जादू-टोना करने के संदेह में हमला किया। इस हमले के संबंध में 11 फरवरी को FIR दर्ज की गई है।
हाईकोर्ट ने बुधवार को गुमला पुलिस अधीक्षक को फटकार लगाई कि उन्होंने चंद्रमुनी उरांव पर हुए हमले के मामले में कोई सख्त कार्रवाई नहीं की। कोर्ट के आदेश पर झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (JHALSA) की टीम ने भी गांव में जाकर कार्रवाई संबंधी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
चंद्रमुनी उरांव ने 2019 में बेटी के लापता होने की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। लेकिन जब पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने 4 सितंबर 2025 को झारखंड हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की। उन्होंने संदेह जताया है कि उनकी बेटी मानव तस्करी की शिकार हो सकती है।
याचिका में उन्होंने यह भी बताया कि 2019 में ही गांव के कुछ लोगों ने उन्हें डायन कहकर मारा-पीटा, लेकिन उस समय पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस का कहना है कि उन्होंने तब इस संबंध में कोई औपचारिक शिकायत नहीं दी थी।
हाईकोर्ट का यह आदेश न केवल बच्चों की त्वरित तलाश के लिए आधार आधारित जांच प्रक्रिया को सुधारने की दिशा में एक कदम है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ हो रहे कुप्रथाओं से जुड़े उत्पीड़न को भी न्यायिक दृष्टि से गंभीरता से लेने का संकेत है।

