झारखंड हाईकोर्ट ने सोमवार को चतरा जिले के लावलौंग थाने में दो छात्रों को 10 दिनों तक बिना कानूनी प्रक्रिया अपनाए हिरासत में रखने के मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस अधीक्षक सुमित अग्रवाल से जवाब तलब किया।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति अरुण कुमार राय की खंडपीठ ने यह निर्देश बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया, जो एक छात्र की मां अख्तरी खातून ने दायर की थी।
याचिका के अनुसार पुलिस ने 26 जनवरी की सुबह दोनों छात्रों को कथित रंगदारी गिरोह से जुड़े होने के संदेह में उठाया था। हालांकि उन्हें न तो पूछताछ के बाद छोड़ा गया और न ही किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। दोनों को 10 दिनों तक थाने में ही रखा गया, जिसके बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
सुनवाई के दौरान एसपी सुमित अग्रवाल व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए। अदालत ने कहा कि पुलिस की कार्रवाई से समाज में संदेश जाता है और यदि पूछताछ के बाद छात्र को छोड़ दिया जाता तो यह एक सकारात्मक संदेश होता।
खंडपीठ ने कहा, “छात्र कोई हार्डकोर अपराधी नहीं होता। यदि वह होता तो उसके खिलाफ मामला दर्ज कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाता या न्यायिक हिरासत में भेजा जाता।”
अदालत ने यह भी कहा कि बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के छात्र को थाने में रखना “कानून की प्रक्रिया से परे” है।
अदालत ने लावलौंग थाने में लंबित मामले की केस डायरी देखी और पाया कि उसमें छात्रों को हिरासत में लेने का कोई उल्लेख नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि जब केस डायरी में हिरासत का कोई रिकॉर्ड नहीं है तो थाने में उनकी मौजूदगी का कोई कानूनी आधार नहीं बनता, जिससे पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
हाईकोर्ट ने एसपी से विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 27 फरवरी को निर्धारित की है।

