पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका की वैधता पर सवाल उठाए हैं जिसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की गई है। राज्य सरकार ने कहा है कि इस मुद्दे से जुड़ा मामला पहले से ही कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है, ऐसे में एक ही विषय पर दो संवैधानिक अदालतों में समानांतर कार्यवाही नहीं चल सकती।
15 जनवरी को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस विपुल पांचोली की पीठ ने ममता बनर्जी, राज्य सरकार, डीजीपी राजीव कुमार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया था। ईडी ने आरोप लगाया है कि 8 जनवरी को कोलकाता के साल्ट लेक स्थित आई-पैक कार्यालय और इसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी के दौरान राज्य मशीनरी ने गंभीर रूप से बाधा डाली।
सुप्रीम कोर्ट ने उस समय टिप्पणी की थी कि मुख्यमंत्री द्वारा ईडी की जांच में कथित रूप से बाधा डालना “गंभीर मामला” है और यह जांच के योग्य है। अदालत ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर भी रोक लगा दी थी।
अब दाखिल अपने जवाब में पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा है कि ईडी की यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मौलिक अधिकारों के आधार पर दाखिल की गई है, जबकि एक जांच एजेंसी को ऐसा अधिकार नहीं है। राज्य ने यह भी कहा कि ईडी बिना उचित प्रक्रिया के “अंधाधुंध तलाशी और जब्ती” नहीं कर सकती, और एजेंसी ने छापेमारी के दौरान विशेषाधिकार प्राप्त संवादों (privileged communication) का उल्लंघन किया।
ईडी ने दावा किया था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद आई-पैक परिसर में पहुंचीं और जांच से जुड़ी “महत्वपूर्ण सामग्री” वहां से हटा ली।
यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में इस सवाल पर विचार के लिए लंबित है कि क्या किसी राज्य की कानून व्यवस्था एजेंसियां केंद्रीय एजेंसियों की जांच में बाधा डाल सकती हैं और क्या दो संवैधानिक अदालतों में एक ही मुद्दे पर अलग-अलग कार्यवाहियां जारी रह सकती हैं।

