हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एनडीपीएस (NDPS) मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी को नियमित जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सह-आरोपी के बयान और वित्तीय लेनदेन (Financial Transactions) की मौजूदगी किसी व्यक्ति को अनिश्चित काल तक हिरासत में रखने के लिए पर्याप्त नहीं है। न्यायमूर्ति राकेश कैंथला की पीठ ने कहा कि जांच के दौरान पुलिस अधिकारी के समक्ष दिया गया सह-आरोपी का इकबालिया बयान कानूनन स्वीकार्य नहीं है और बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के इसका उपयोग दूसरे आरोपी को फंसाने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 22 मई 2025 को सोलन जिले के पुलिस थाना मानपुरा में दर्ज एफआईआर संख्या 52/2025 से संबंधित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, गश्त पर निकली पुलिस टीम को गुप्त सूचना मिली थी कि सह-आरोपी विश्वजीत मंडल अपने क्लिनिक में चरस और नशीली दवाएं बेच रहा है।
इस सूचना पर कार्रवाई करते हुए, पुलिस ने ड्रग इंस्पेक्टर और स्वतंत्र गवाहों के साथ क्लिनिक पर छापा मारा। तलाशी के दौरान पुलिस ने 425 रुपये, एक पॉलिथीन पैकेट में 859 ग्राम चरस और एक इलेक्ट्रॉनिक तराजू बरामद किया।
पूछताछ के दौरान, सह-आरोपी विश्वजीत मंडल ने कथित तौर पर खुलासा किया कि यह चरस महेंद्र सिंह (याचिकाकर्ता) ने उसके क्लिनिक में रखी थी और इसके बदले में उसे पैसे दिए थे। पुलिस ने इसी खुलासे, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और सिंह द्वारा मंडल को ट्रांसफर किए गए 1,48,360 रुपये के बैंक लेनदेन को आधार बनाकर याचिकाकर्ता को गिरफ्तार किया था।
दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता कुलविंदर सिंह गिल ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे केवल सह-आरोपी के बयान के आधार पर झूठा फंसाया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता से कोई बरामदगी नहीं हुई है और पुलिस अदालत में चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, इसलिए उसे हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता लोकेंद्र कुटलेहरिया ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता नशीले पदार्थों को बेचने की साजिश में शामिल था। उन्होंने कहा कि 1,48,360 रुपये का वित्तीय लेनदेन और दोनों आरोपियों के बीच की कॉल रिकॉर्ड्स अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि करते हैं।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, विशेष रूप से सह-आरोपी के बयान, सीडीआर और वित्तीय लेनदेन की कानूनी वैधता की जांच की।
सह-आरोपी के बयान की स्वीकार्यता पर: सुप्रीम कोर्ट के तोफान सिंह बनाम तमिलनाडु राज्य (2021) और दीपकभाई जगदीशचंद्र पटेल बनाम गुजरात राज्य (2019) के फैसलों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि पुलिस अधिकारी को दिया गया बयान भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत बाधित है।
कोर्ट ने कहा:
“इसलिए, अभियोजन पक्ष याचिकाकर्ता को फंसाने के लिए सह-आरोपी द्वारा दिए गए इकबालिया बयान का कोई लाभ नहीं उठा सकता।”
कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पर: अदालत ने साइना देवी बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य (2022) में अपनी ही समन्वय पीठ के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि केवल सीडीआर जमानत से इनकार करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
कोर्ट ने नोट किया:
“सीडीआर और सह-आरोपी के खुलासे के अलावा, याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई अन्य सामग्री एकत्र नहीं की गई है… याचिकाकर्ता जमानत का हकदार है।”
वित्तीय लेनदेन पर: राज्य द्वारा 1,48,360 रुपये के बैंक हस्तांतरण पर जोर दिए जाने के संबंध में, कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के अमल ई बनाम केरल राज्य (2023) के फैसले का हवाला दिया। अदालत ने माना कि यह साबित किए बिना कि पैसा विशेष रूप से नशीले पदार्थों की बिक्री से जुड़ा था, केवल मौद्रिक लेनदेन जमानत स्तर पर आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह सच है कि दस्तावेज याचिकाकर्ताओं और कुछ आरोपियों के बीच मौद्रिक लेनदेन का संकेत देते हैं, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या उक्त लेनदेन नशीले पदार्थों की बिक्री के संबंध में थे। इसे स्थापित करने के लिए, आरोपी के इकबालिया बयानों के अलावा, कुछ भी नहीं है।”
फैसला
यह देखते हुए कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि “उसे हिरासत में रखने से कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।”
अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए महेंद्र सिंह को 1,00,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि की एक जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने निम्नलिखित शर्तें भी निर्धारित कीं:
- याचिकाकर्ता गवाहों को नहीं डराएगा और न ही सबूतों के साथ छेड़छाड़ करेगा।
- उसे अपना पासपोर्ट अदालत में जमा करना होगा।
- उसे अपना मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया संपर्क पुलिस को उपलब्ध कराने होंगे।
केस विवरण
- केस शीर्षक: महेंद्र सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
- केस नंबर: Cr. MP (M) No. 2583 of 2025
- बेंच: न्यायमूर्ति राकेश कैंथला
- अधिवक्ता: श्री कुलविंदर सिंह गिल (याचिकाकर्ता के लिए), श्री लोकेंद्र कुटलेहरिया, अतिरिक्त महाधिवक्ता (राज्य के लिए)

