भरण-पोषण के मामलों में इनकम एफिडेविट फाइल न करने पर कोर्ट पति के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकता है: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा है कि यदि पति पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद अंतरिम भरण-पोषण (Interim Maintenance) की कार्यवाही में अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल करने में विफल रहता है, तो अदालत उसके खिलाफ ‘प्रतिकूल निष्कर्ष’ (Adverse Inference) निकाल सकती है।

न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने पति द्वारा दायर एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज कर दिया। पति ने फैमिली कोर्ट, पीलीभीत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 3,500 रुपये देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आय के खुलासे पर जोर देना निष्पक्ष मूल्यांकन सुनिश्चित करने और वित्तीय जानकारी छिपाने से रोकने के लिए आवश्यक है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत दायर भरण-पोषण आवेदन से उत्पन्न हुआ है। पक्षकारों का विवाह 14 जून, 2020 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी का आरोप है कि दहेज की मांग के कारण उसे 14 मार्च, 2022 को ससुराल से निकाल दिया गया और तब से वह अपने माता-पिता के साथ रह रही है।

पत्नी ने दावा किया कि अलग होने के बाद से पति ने उसे कोई भरण-पोषण नहीं दिया है। उसने अपनी पढ़ाई और चिकित्सा सहित दैनिक खर्चों के लिए 15,000 रुपये मासिक और मुकदमे के खर्च के लिए 2,000 रुपये प्रति माह की मांग की थी।

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12 अगस्त, 2024 को फैमिली कोर्ट, पीलीभीत के अपर प्रधान न्यायाधीश ने पाया कि पति ने अपनी आय का खुलासा नहीं किया है। इस पर कोर्ट ने उसके खिलाफ निष्कर्ष निकालते हुए उसे 3,500 रुपये प्रति माह अंतरिम भरण-पोषण देने का आदेश दिया। इस आदेश से असंतुष्ट होकर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

पत्नी ने अपनी आय, संपत्ति और शैक्षिक योग्यता का विवरण देते हुए हलफनामा प्रस्तुत किया और बताया कि वह वर्तमान में बेरोजगार है। उसने दावा किया कि निगरानीकर्ता (पति) के पास 75 बीघा कृषि भूमि है, वह पट्टे पर खेती करता है और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग कक्षाएं चलाता है, जिससे उसकी आय लगभग 40,000 रुपये प्रति माह है।

इसके विपरीत, पति के वकील ने तर्क दिया कि पति की आय का कोई स्रोत नहीं है, वह कोई कोचिंग नहीं चलाता है और राजस्व रिकॉर्ड में उसके नाम पर कोई कृषि भूमि नहीं है। वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट का आदेश अवैध और मनमाना है क्योंकि पत्नी एक सुशिक्षित महिला है और अपनी आजीविका कमाने में सक्षम है।

इस दावे के समर्थन में वकील ने पत्नी की मार्कशीट का हवाला दिया, जिसमें दिखाया गया कि उसने 2011 में एम.ए. और 2ुल024 में एल.एल.बी. (LL.B.) पूरा किया है।

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

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कोर्ट ने नोट किया कि यह विवादित नहीं है कि पति ने अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल नहीं किया था।

इस तरह के गैर-खुलासे के कानूनी परिणाम को संबोधित करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“यह तय कानून है कि यदि पति पर्याप्त अवसर दिए जाने के बावजूद अंतरिम भरण-पोषण याचिका में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश XIX नियम 3 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 / भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 109 के अनुसार अपनी आय और संपत्ति का खुलासा करने वाला हलफनामा दाखिल करने में विफल रहता है, तो अदालतें उसके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकाल सकती हैं।”

कोर्ट ने ऐसे खुलासे की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा:

“संपत्ति और देनदारियों के खुलासे के हलफनामे पर फैमिली कोर्ट का भरोसा अंतरिम भरण-पोषण का निष्पक्ष और सूचित मूल्यांकन सुनिश्चित करता है, जिससे आय को छिपाने और वित्तीय गलतबयानी की संभावना को रोका जा सके।”

भरण-पोषण की राशि के संबंध में, न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि अंतरिम स्तर पर निर्णय पत्नी की पात्रता पर आधारित होता है और यह “सटीक गणितीय गणना” पर आधारित नहीं हो सकता। कोर्ट ने पत्नी के शिक्षा खर्च के दावे में दम पाया और कहा कि उसने 2024 में अपनी एल.एल.बी. पूरी की है, इसलिए उसका दावा “प्रथम दृष्टया सही” है।

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कोर्ट ने यह भी माना कि पति यह साबित करने में विफल रहा कि पत्नी के पास आय का कोई स्रोत है या वह अपनी योग्यता के बावजूद किसी लाभकारी रोजगार में लगी हुई है।

फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीलीभीत फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं पाई। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पत्नी एक सभ्य जीवन स्तर सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता पाने की हकदार है।

तय की गई राशि को सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा:

“3,500 रुपये की जो राशि पति द्वारा पत्नी को देने का निर्देश दिया गया है, उसे अधिक नहीं कहा जा सकता है और यह मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में न्यायसंगत और उचित है।”

नतीजतन, आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश में की गई टिप्पणियां गुण-दोष के आधार पर मामले का अंतिम रूप से निर्णय करते समय ट्रायल कोर्ट को प्रभावित नहीं करेंगी।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: श्याम मोहन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 4929 वर्ष 2024
  • बेंच: न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद

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