वक्फ ट्रिब्यूनल में मुकदमे दायर करने पर कोर्ट फीस अनिवार्य, गुजरात हाईकोर्ट ने 150 याचिकाएं खारिज कीं

 गुजरात हाईकोर्ट ने बुधवार को मुस्लिम वक्फ संस्थानों को बड़ा झटका देते हुए लगभग 150 याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने साफ कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष विवाद उठाने के लिए कोर्ट फीस से कोई सामान्य छूट नहीं दी जा सकती और ऐसे मामलों में गुजरात कोर्ट फीस अधिनियम लागू होगा।

न्यायमूर्ति जे.सी. दोशी ने उन वक्फ संस्थाओं की दलीलों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिन्होंने यह तर्क दिया था कि वक्फ अधिनियम में कोर्ट फीस का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए ट्रिब्यूनल में दायर मामलों पर शुल्क नहीं लिया जा सकता। इन याचिकाकर्ताओं में सुन्नी मुस्लिम ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट, वडोदरा सहर मस्जिद सभा ट्रस्ट और अहमदाबाद की सरखेज रोज़ा कमेटी जैसे प्रमुख वक्फ ट्रस्ट शामिल थे।

ये सभी मामले गुजरात राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल के समक्ष वक्फ संपत्तियों से जुड़े विवादों से संबंधित थे, जिनमें किराया विवाद, संपत्ति पर कब्जे की बहाली, कथित अतिक्रमण हटाने और उपयोग अधिकारों जैसे मुद्दे शामिल थे। वक्फ संस्थाओं ने वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल में मुकदमे दायर कर संपत्तियों का कब्जा वापस लेने और उससे जुड़े अन्य राहतों की मांग की थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले मूल रूप से विवादात्मक होते हैं, जहां पक्षकारों के अधिकारों और दायित्वों का न्यायिक निर्धारण किया जाता है। इसलिए, भले ही इन्हें “आवेदन” कहा गया हो, लेकिन उनके स्वरूप और प्रभाव को देखते हुए वे दीवानी वाद (सूट) के समान हैं और इस कारण उन पर गुजरात कोर्ट फीस अधिनियम, 2004 के प्रावधान लागू होंगे।

अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि वक्फ ट्रिब्यूनल ने प्रारंभिक जांच के दौरान पाया था कि वक्फ संस्थाओं ने अपने मुकदमों का सही मूल्यांकन नहीं किया और निर्धारित कोर्ट फीस जमा नहीं की। वर्ष 2024 में ट्रिब्यूनल ने उन्हें मूल्यांकन सुधारने और बकाया कोर्ट फीस जमा करने का निर्देश दिया था, साथ ही चेतावनी दी थी कि ऐसा न करने पर वाद खारिज कर दिए जाएंगे।

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इसके बावजूद, वक्फ संस्थाएं न तो मूल्यांकन सुधार सकीं और न ही आवश्यक शुल्क जमा कर पाईं। नतीजतन, ट्रिब्यूनल ने अलग-अलग आदेशों के जरिए उनके वाद खारिज कर दिए। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल के शुरुआती आदेश को समय रहते किसी उच्च मंच पर चुनौती नहीं दी गई, इसलिए बाद में वाद खारिज होने के आदेशों को कोर्ट फीस के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गुजरात कोर्ट फीस अधिनियम की धारा 1(5) के अनुसार, राज्य के सभी न्यायालयों और सार्वजनिक कार्यालयों में देय शुल्क पर यही कानून लागू होता है, जब तक कि किसी विशेष कानून में अलग प्रावधान न हो। साथ ही, अधिनियम की धारा 4 किसी भी दस्तावेज को बिना शुल्क के दाखिल या दर्ज करने पर रोक लगाती है।

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हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि वक्फ ट्रिब्यूनल को दीवानी अदालत के समान शक्तियां प्राप्त हैं। केवल याचिका को “आवेदन” कह देने से उसकी प्रकृति नहीं बदल जाती, यदि वह वास्तविक रूप से पक्षकारों के अधिकारों का निर्धारण चाहती है।

अदालत ने अंत में कहा कि गुजरात में वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत दायर हर मामले को कोर्ट फीस से मुक्त नहीं किया जा सकता। इस तरह की कोई सार्वभौमिक छूट नहीं है। ट्रिब्यूनल के आदेशों में कोई कानूनी त्रुटि या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी खामी नहीं पाई गई, जिसके आधार पर हाईकोर्ट हस्तक्षेप करे।

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