सरकारी आवास नहीं मिलने पर फुटपाथ पर सोने की धमकी देने वाली जज की बर्खास्तगी गुजरात हाईकोर्ट ने रखी बरकरार

गुजरात हाईकोर्ट ने सरकारी आवास नहीं मिलने पर फुटपाथ पर सोने की धमकी देने वाली सीनियर सिविल जज ए. एच. दवे की बर्खास्तगी को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने माना कि सरकारी आवास को लेकर उनका व्यवहार और वरिष्ठ जजों के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा में लिखे गए पत्र न्यायिक अधिकारी के पद की गरिमा और अनुशासन के खिलाफ थे।

जस्टिस एन. एस. संजय गौड़ा और जस्टिस जे. एल. ओडेदरा की डिवीजन बेंच ने 9 अक्टूबर को दिए फैसले में जज की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ विभागीय जांच में लगाए गए आरोप मौखिक गवाही, दस्तावेजों और वीडियो साक्ष्यों के आधार पर साबित हुए थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों से अनुशासित और गरिमापूर्ण व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। सरकारी आवास हासिल करने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों पर दबाव बनाना या धमकी देना इस जिम्मेदारी के अनुरूप नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को हर नियुक्ति स्थल पर सरकारी आवास उपलब्ध कराना अनिवार्य नहीं है। सरकारी आवास उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में अधिकारी मकान किराया भत्ता लेकर अपने रहने की व्यवस्था कर सकते हैं।

सरकारी आवास को लेकर कैसे शुरू हुआ विवाद?

यह मामला अक्टूबर 2012 का है, जब ए. एच. दवे का तबादला वडोदरा से डीसा किया गया था। वहां उन्हें चौथे अतिरिक्त सीनियर सिविल जज के पद पर नियुक्त किया गया।

तबादले के बाद दवे ने सरकारी आवास की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट रजिस्ट्री ने उन्हें बताया कि उस समय न्यायिक अधिकारियों के लिए सरकारी आवास उपलब्ध नहीं था और उन्हें अपने रहने की व्यवस्था स्वयं करनी होगी।

READ ALSO  पंजाब सरकार द्वारा धारा 18 बीएनएसएस के तहत लोक अभियोजकों की सूची अधिसूचित किए जाने तक रजिस्ट्री आपराधिक अपीलों को सूचीबद्ध नहीं करेगी: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

इस जवाब से असंतुष्ट होकर उन्होंने पालनपुर के प्रधान जिला जज को फैक्स भेजा और फुटपाथ पर रात बिताने की अनुमति मांगी।

उन्होंने पालनपुर से डीसा के बीच रोजाना आने-जाने और इसके लिए यात्रा एवं दैनिक भत्ता दिए जाने की भी मांग की। साथ ही जिला कलेक्टर के माध्यम से उनके रहने की व्यवस्था कराने का अनुरोध किया।

इस पूरे मामले को लेकर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई।

रात में कोर्ट परिसर में रुकने को लेकर भी उठे सवाल

विभागीय जांच में 20 नवंबर 2012 की एक घटना का भी उल्लेख किया गया।

उस दिन डीसा के कुछ न्यायिक अधिकारी नए साल की शुभकामनाएं देने पालनपुर जिला कोर्ट पहुंचे थे। अन्य अधिकारी वापस लौट गए, लेकिन दवे देर शाम तक कोर्ट परिसर में रुकी रहीं।

रिकॉर्ड के अनुसार, रात करीब 9:30 बजे दूसरे न्यायिक अधिकारियों ने उनसे संपर्क किया और उन्हें डीसा लौटने के लिए समझाया।

उन पर यह भी आरोप था कि उन्होंने डीसा कोर्ट परिसर के बाहर अपनी कार में रात बिताने की धमकी दी थी।

इन घटनाओं को न्यायिक अनुशासन के खिलाफ मानते हुए विभागीय जांच में शामिल किया गया।

हाईकोर्ट के जज के तबादले की मांग और चीफ जस्टिस के खिलाफ पत्र

सरकारी आवास का विवाद ही उनके खिलाफ कार्रवाई का एकमात्र कारण नहीं था। वर्ष 2013 में लिखे गए दो पत्रों को लेकर भी अलग विभागीय जांच शुरू की गई थी।

दवे ने 1 अगस्त 2013 को एक पत्र लिखकर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और अन्य जजों से एक मौजूदा हाईकोर्ट जज के तबादले की सिफारिश करने की मांग की थी।

READ ALSO  छह साल की बच्ची से अपराधी का पूरा नाम जानने की उम्मीद नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बलात्कार के लिए सजा बरकरार रखी

इसके अलावा 18 जुलाई 2013 को लिखे गए एक अन्य पत्र में तत्कालीन चीफ जस्टिस के संबंध में ऐसी भाषा इस्तेमाल की गई थी, जिसे अनुचित और अपमानजनक माना गया।

हाईकोर्ट ने इन पत्रों पर गंभीर आपत्ति जताई।

बेंच ने पाया कि एक न्यायिक अधिकारी द्वारा इस तरह की भाषा का इस्तेमाल और वरिष्ठ जजों के संबंध में ऐसी मांग करना न्यायिक सेवा के अनुशासन के अनुरूप नहीं था।

हर न्यायिक अधिकारी को सरकारी आवास देना जरूरी नहीं: हाईकोर्ट

सरकारी आवास के विवाद पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर नियुक्ति स्थल पर न्यायिक अधिकारी को सरकारी क्वार्टर उपलब्ध कराना अनिवार्य नहीं है।

यदि सरकारी आवास उपलब्ध नहीं है, तो अधिकारी मकान किराया भत्ता प्राप्त करके निजी आवास की व्यवस्था कर सकता है।

कोर्ट ने माना कि दवे सरकारी आवास की मांग को लेकर न्यायिक प्रशासन पर इस तरह दबाव नहीं बना सकती थीं।

बेंच के अनुसार, फुटपाथ पर सोने की धमकी जैसे कदम न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि आवास संबंधी विवाद में उनका आचरण अपने आप में गंभीर था और अनुशासनात्मक कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त था।

निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलने की दलील खारिज

बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए दवे ने तर्क दिया कि उनके खिलाफ विभागीय जांच निष्पक्ष तरीके से नहीं की गई और उन्हें अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला।

उन्होंने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने जांच की प्रक्रिया और रिकॉर्ड देखने के बाद इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने पाया कि दवे को विभागीय कार्रवाई में भाग लेने और अपना बचाव करने के अवसर दिए गए थे, लेकिन उन्होंने कई बार इन अवसरों का इस्तेमाल नहीं किया।

READ ALSO  लुधियाना में किसानों के विरोध के बीच हाई कोर्ट ने लाधोवाल टोल को फिर से शुरू करने का आदेश दिया

हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि उन्हें विभागीय जांच में अपनी ओर से वकील रखने की अनुमति दी गई थी।

ऐसे में बेंच ने माना कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं मिलने का आरोप सही नहीं था।

कोर्ट ने यह भी पाया कि जांच अधिकारियों के निष्कर्ष मौखिक गवाही, दस्तावेजों और वीडियो साक्ष्यों से समर्थित थे।

हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने स्वीकार की थी बर्खास्तगी की सिफारिश

विभागीय जांच पूरी होने के बाद हाईकोर्ट की स्टैंडिंग कमेटी ने दवे को न्यायिक सेवा से बर्खास्त करने की सिफारिश की थी।

दिसंबर 2023 में हाईकोर्ट की फुल कोर्ट ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया। इसके बाद राज्य सरकार ने उनकी बर्खास्तगी का आदेश जारी किया।

दवे ने इस कार्रवाई को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले पर विचार करते हुए डिवीजन बेंच ने विभागीय जांच के निष्कर्षों, उपलब्ध साक्ष्यों और याचिकाकर्ता की आपत्तियों की जांच की।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनके खिलाफ साबित हुआ आचरण गंभीर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है और इस आधार पर दी गई बर्खास्तगी की सजा में हस्तक्षेप करने का कोई उचित कारण नहीं है।

इसके साथ ही गुजरात हाईकोर्ट ने ए. एच. दवे की याचिका खारिज करते हुए न्यायिक सेवा से उनकी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles