गुजरात हाईकोर्ट ने अमूल ब्रांड के उत्पादों की मार्केटिंग करने वाली गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन को बड़ी राहत देते हुए उस पर लगाई गई ₹43.43 करोड़ की GST मांग रद्द कर दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि हेड ऑफिस की ओर से अलग-अलग GST रजिस्ट्रेशन वाली ब्रांचों को दी जाने वाली सेवाओं का मूल्य संबंधित GST नियमों के तहत शून्य माना जाएगा, यदि इसके लिए निर्धारित शर्तें पूरी होती हैं।
जस्टिस ए. एस. सुपेहिया और जस्टिस वैभवी डी. नानावटी की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर टैक्स देनदारी तय नहीं की जा सकती कि किसी कंपनी या संस्था ने अपने हेड ऑफिस के साझा खर्चों को अलग-अलग ब्रांचों में बांटने के लिए क्रॉस-चार्जिंग की प्रक्रिया नहीं अपनाई।
हाईकोर्ट ने केंद्रीय GST के अतिरिक्त आयुक्त, अहमदाबाद दक्षिण द्वारा 1 जनवरी 2025 को पारित आदेश रद्द कर दिया। इस आदेश में अमूल के खिलाफ ₹43,43,12,441 के इंटीग्रेटेड GST (IGST) की मांग के साथ ब्याज और जुर्माना भी लगाया गया था।
हेड ऑफिस से ब्रांचों को दी गई सेवाओं पर क्यों हुआ विवाद?
मामला जुलाई 2017 से मार्च 2019 के बीच अमूल के आनंद स्थित हेड ऑफिस द्वारा किए गए खर्चों से जुड़ा था। इनमें विज्ञापन, कानूनी सेवाओं, आईटी सिस्टम और अन्य साझा प्रशासनिक कार्यों पर होने वाला खर्च शामिल था।
ये खर्च अलग-अलग ब्रांचों और डिपो के कामकाज से भी जुड़े थे, लेकिन फेडरेशन ने इन्हें क्रॉस-चार्जिंग के जरिए संबंधित इकाइयों में नहीं बांटा था।
क्रॉस-चार्जिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें किसी संगठन का एक कार्यालय दूसरे कार्यालय को दी गई सेवाओं या उसके हिस्से के खर्च के लिए बिल जारी करता है।
GST विभाग का कहना था कि अलग-अलग GST रजिस्ट्रेशन रखने वाली ब्रांचों को कानून के तहत अलग इकाइयां माना जाता है। इसलिए हेड ऑफिस द्वारा इन ब्रांचों को दी गई सेवाओं पर GST देना जरूरी था, भले ही उनके बीच कोई बिल जारी नहीं किया गया हो।
विभाग ने इसी आधार पर टैक्स की मांग की थी।
बिना बिल जारी किए सेवाओं का मूल्य शून्य माना जाएगा
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर नियमों के नियम 28 और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) द्वारा जारी स्पष्टीकरणों की जांच की।
बेंच ने कहा कि इन स्पष्टीकरणों के अनुसार, निर्धारित शर्तें पूरी होने पर हेड ऑफिस द्वारा अपनी ब्रांचों को दी गई सेवाओं का मूल्य शून्य माना जा सकता है, यदि हेड ऑफिस ने कोई टैक्स इनवॉइस जारी नहीं किया है और संबंधित ब्रांच पूरी इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) लेने की पात्र है।
हाईकोर्ट ने पाया कि GST विभाग ने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि अमूल के हेड ऑफिस ने संबंधित सेवाओं के लिए अपनी ब्रांचों और डिपो को कोई टैक्स इनवॉइस जारी नहीं किया था।
ऐसी स्थिति में कोर्ट ने कहा कि नियम 28 के तहत इन सेवाओं का मूल्य शून्य माना जाना चाहिए और इस मामले में कोई टैक्स देनदारी नहीं बनती।
बेंच ने विभाग की उस प्रक्रिया को भी गलत माना, जिसके तहत हेड ऑफिस के कुल खर्चों को अलग-अलग ब्रांचों के टर्नओवर के अनुपात में बांटकर टैक्स की गणना की गई थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल क्रॉस-चार्जिंग नहीं अपनाने के कारण विभाग अपनी ओर से साझा खर्चों का अनुपात के आधार पर बंटवारा करके सेवाओं का टैक्स योग्य मूल्य निर्धारित नहीं कर सकता।
क्रॉस-चार्जिंग नहीं करना टैक्स चोरी का सबूत नहीं
मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण सवाल CGST एक्ट की धारा 74 के इस्तेमाल को लेकर था।
इस प्रावधान के तहत धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत जानकारी देने या टैक्स चोरी के इरादे से तथ्यों को छिपाने वाले मामलों में विभाग को बढ़ी हुई समय-सीमा के भीतर टैक्स की मांग करने का अधिकार मिलता है।
GST विभाग ने अमूल के खिलाफ इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया था। उसका आरोप था कि हेड ऑफिस के खर्चों की क्रॉस-चार्जिंग नहीं करके फेडरेशन ने टैक्स का भुगतान नहीं किया।
अमूल ने इस आरोप का विरोध करते हुए कहा कि संबंधित सभी खर्च उसके लेखा रिकॉर्ड में दर्ज थे। इसलिए क्रॉस-चार्जिंग नहीं करने को टैक्स चोरी या जानकारी छिपाने का मामला नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने पाया कि हेड ऑफिस के खर्च फेडरेशन की अकाउंट बुक, लेजर और बैलेंस शीट में दर्ज थे।
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि किसी जांच के दौरान जानकारी सामने आना अपने आप में धारा 74 लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने माना कि केवल हेड ऑफिस से ब्रांचों को दी गई आंतरिक सेवाओं के लिए क्रॉस-चार्जिंग नहीं अपनाने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि फेडरेशन ने जानबूझकर टैक्स चोरी की, धोखाधड़ी की या टैक्स बचाने के इरादे से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए।
बेंच ने कहा कि विभाग ऐसे आरोपों को साबित करने के लिए जरूरी आधार स्थापित नहीं कर पाया।
इनपुट टैक्स क्रेडिट के तर्क पर भी कोर्ट ने किया विचार
सुनवाई के दौरान अमूल ने यह दलील भी दी कि यदि हेड ऑफिस की सेवाओं पर GST लगाया जाता, तो संबंधित ब्रांचें निर्धारित शर्तों के अनुसार उस रकम का इनपुट टैक्स क्रेडिट प्राप्त कर सकती थीं।
इस तरह फेडरेशन के अनुसार, यह मामला सरकार के राजस्व के लिहाज से तटस्थ था, क्योंकि एक ओर जमा किया गया टैक्स दूसरी ओर क्रेडिट के रूप में उपलब्ध हो सकता था।
हाईकोर्ट ने इस दलील पर भी गौर किया।
बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि GST अधिकारियों ने सेवाओं का टैक्स योग्य मूल्य गलत तरीके से निर्धारित किया था। साथ ही, धोखाधड़ी या तथ्यों को छिपाने से जुड़े कानूनी प्रावधान लागू करने के लिए भी पर्याप्त आधार नहीं था।
इन निष्कर्षों के आधार पर गुजरात हाईकोर्ट ने अमूल की याचिका स्वीकार करते हुए 1 जनवरी 2025 का आदेश रद्द कर दिया। इसके साथ ही ₹43.43 करोड़ की IGST मांग तथा उससे जुड़े ब्याज और जुर्माने को भी रद्द कर दिया गया।

