सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि भूमि अधिग्रहण के मामले में कुछ भूस्वामी अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर धोखाधड़ी करते हैं, तो केवल इस आधार पर उन अन्य भूस्वामियों का अवार्ड रद्द नहीं किया जा सकता जो इस अनियमितता में शामिल नहीं थे।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने उस भूस्वामी की अपील को स्वीकार कर लिया, जिसका मुआवजा केवल इसलिए रोक दिया गया था और बाद में रद्द कर दिया गया था क्योंकि अन्य व्यक्तियों के खिलाफ अनुचित लाभ (Unjust Enrichment) और भ्रष्टाचार के आरोप में कार्यवाही शुरू की गई थी।
कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या कुछ भूस्वामियों द्वारा अधिकारियों के साथ मिलीभगत कर अत्यधिक मुआवजा प्राप्त करने के कारण पूरे अधिग्रहण अवार्ड को रद्द किया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इसका नकारात्मक उत्तर दिया और अपीलकर्ता नीरज जैन के पक्ष में मुआवजा अवार्ड बहाल कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता का नाम न तो एफआईआर में था और न ही वह उन कार्यवाहियों में पक्षकार था जिनमें धोखाधड़ी वाले अवार्ड्स को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद छत्तीसगढ़ में एक विशेष रेल परियोजना (रावघाट-जगदलपुर, 140 किमी) के लिए 31 अगस्त 2017 को अधिसूचित भूमि अधिग्रहण से उत्पन्न हुआ था। सक्षम प्राधिकारी द्वारा अवार्ड पारित किए जाने के बाद, कुछ भूस्वामियों ने भूमि अधिग्रहण (विशेष रेलवे परियोजनाएं) नियम, 2016 के तहत मध्यस्थ (Arbitrator) से संपर्क किया और उन्हें बढ़ा हुआ मुआवजा प्रदान किया गया।
बाद में, एक जांच शुरू की गई जिसमें आरोप लगाया गया कि राजस्व अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके वास्तविक भूमि मूल्य से काफी अधिक राशि का अवार्ड दिया गया। कलेक्टर की जांच रिपोर्ट के आधार पर, सक्षम प्राधिकारी, मध्यस्थ और कथित धोखाधड़ी के लाभार्थी भूस्वामियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। बस्तर रेलवे प्राइवेट लिमिटेड ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें राज्य के अधिकारियों और पांच विशिष्ट भूस्वामियों को प्रतिवादी बनाया गया, जिन पर “शक्तियों के दुरुपयोग” का आरोप था।
10 जनवरी 2022 को, हाईकोर्ट ने रेलवे की याचिका स्वीकार करते हुए 12 फरवरी 2018 के अवार्ड और 11 जुलाई 2019 के मध्यस्थम अवार्ड को रद्द कर दिया और मुआवजे की पुनर्गणना का निर्देश दिया।
अपीलकर्ता, नीरज जैन, एक अलग गांव के भूस्वामी थे, जिन्हें 12 फरवरी 2018 को अवार्ड और 28 जून 2019 को मध्यस्थ द्वारा बढ़ी हुई राशि प्रदान की गई थी। कलेक्टर की जांच रिपोर्ट के बाद, 2 अगस्त 2019 को उनके अतिरिक्त मुआवजे के वितरण पर रोक लगा दी गई। बाद में, 21 फरवरी 2022 को, कमिश्नर (बस्तर संभाग) ने आरोपी भूस्वामियों के खिलाफ हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए अपीलकर्ता का अवार्ड भी रद्द कर दिया। इसके खिलाफ अपीलकर्ता की याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता के पक्ष में पारित अवार्ड के संबंध में “न तो आरोपों में कोई समानता है और न ही कोई दाग है।” उन्होंने कहा कि कुल 550 भूस्वामियों में से कार्यवाही केवल विशिष्ट व्यक्तियों के खिलाफ की गई थी। अपीलकर्ता का कहना था कि उन्हें रेलवे की उस रिट याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया था जिसमें अवार्ड रद्द किया गया था, और उनके खिलाफ कोई आपराधिक कार्यवाही भी शुरू नहीं की गई थी।
रेलवे की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) बृजेंद्र चाहर ने तर्क दिया कि जिस फैसले के तहत प्रारंभिक अवार्ड रद्द किया गया था, उसे प्रभावित भूस्वामियों ने एक अलग विशेष अनुमति याचिका (SLP) में चुनौती दी है। उन्होंने दलील दी कि जब तक दूसरी एसएलपी पर सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक वर्तमान अपील को लंबित रखा जाना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे की इस दलील को खारिज कर दिया कि लंबित एसएलपी का अपीलकर्ता के मामले पर कोई असर पड़ेगा। कोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट और एफआईआर उन विशिष्ट भूस्वामियों के खिलाफ थी जिन्होंने अनुचित लाभ प्राप्त किया था।
पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने कहा:
“मौजूदा अपीलकर्ता वह भूस्वामी नहीं है जिसके खिलाफ जांच रिपोर्ट के आधार पर कार्यवाही की गई हो, न ही उसका खाता फ्रीज किया गया और न ही उसे दर्ज एफआईआर में आरोपी बनाया गया।”
कोर्ट ने नोट किया कि रेलवे ने अपनी रिट याचिका में 550 भूस्वामियों में से केवल पांच लोगों को पक्षकार बनाया था। कोर्ट ने कहा:
“चूंकि अपीलकर्ता के खिलाफ रिफंड या अभियोजन के लिए कोई कार्यवाही नहीं की गई थी, इसलिए रेलवे द्वारा विशेष रूप से लक्षित अन्य लोगों द्वारा दायर एसएलपी के परिणाम का वर्तमान मामले में कोई महत्व नहीं होगा।”
पीठ ने यह भी बताया कि अधिकारियों ने जिस हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा किया था, उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अवार्ड विशिष्ट प्रतिवादियों (बाली नागवंशी, नीलिमा बेलसरिया और अन्य) के संबंध में शून्य और अवैध था। कोर्ट ने जोर देकर कहा:
“हम यह देखे बिना नहीं रह सकते कि जबकि मध्यस्थम अवार्ड और प्रारंभिक अवार्ड को रद्द कर दिया गया था, विद्वान एकल न्यायाधीश को यह ध्यान देना चाहिए था कि चुनौती केवल उन पांच प्रतिवादियों के खिलाफ थी जिन्हें उसमें पक्षकार बनाया गया था और अवार्ड का रद्द होना केवल उन्हें ही प्रभावित कर सकता है।”
कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि रेलवे ने अपीलकर्ता के पक्ष में पारित मध्यस्थम अवार्ड को चुनौती नहीं दी थी। कोर्ट ने वैधानिक शक्ति की कमी का भी उल्लेख करते हुए कहा:
“यह भी प्रासंगिक है कि रेलवे अधिनियम, 1989 केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत सक्षम प्राधिकारी या 2016 के नियमों के तहत नियुक्त मध्यस्थ को समीक्षा (Review) करने की कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता के अवार्ड को रद्द करने वाले आदेशों में हस्तक्षेप न करके “घोर त्रुटि” की है। कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले और कमिश्नर, बस्तर संभाग के आदेशों को रद्द कर दिया।
पीठ ने आदेश दिया:
“अपीलकर्ता के पक्ष में पारित 12.02.2018 का प्रारंभिक अवार्ड और 28.02.2019 को मध्यस्थ द्वारा दी गई बढ़ोतरी को बहाल किया जाता है। पहले से दी गई राशि को घटाकर, वितरण की तिथि तक लागू ब्याज और सोलेटियम (Solatium) सहित पूरी अवार्ड राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर किया जाएगा।”
अपील स्वीकार कर ली गई।
केस का विवरण:
केस का नाम: नीरज जैन बनाम सक्षम प्राधिकारी-सह-अतिरिक्त कलेक्टर, जगदलपुर व अन्य
केस संख्या: 2026 आईएनएससी 86 (सिविल अपील संख्या …. 2026 @ एसएलपी (सी) संख्या 7061/2025)
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

