फ़िल्म सेंसरशिप क़ानून में बदलाव के विरूद्ध आये फरहान अख्तर समेत बॉलीवुड के 1400 लोग

महाराष्ट्र–बॉलीवुड की जो फिल्म ऑलरेडी रिलीज हो चुकी है, उसके विरूद्ध शिकायत होने पर फिर सेंसर करने के कानून सुधार का प्रोड्यूसर्स गिल्ड ने विरोध जाहिर किया है। फरहान अख्तर, हंसल मेहता और अनुराग कश्यप सहित 1400 लोगों ने इस सुधार के खिलाफ याचिका दायर की है। दूसरी और श्याम बेनेगल ने इस सुधार के समर्थन में कहा है कि कोई सर्टिफिकेशन स्थाई तौर पर लागू नहीं हो सकता।

सरकार ने सिनेमेटोग्राफ (अमेंडमेंट) बिल, 2021 का ड्राफ्ट सार्वजनिक किया है। इस पर 2 जुलाई तक सुझाव मांगे गए हैं, लेकिन कुछ फिल्म मेकर्स का कहना है कि हम सरकार से और वक्त की मांग करेंगे।

प्रोड्यूसर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के सीईओ नितिन तेज आहूजा का कहना है कि फिलहाल फिल्म इंडस्ट्री कोरोना के प्रभाव से संघर्ष कर रही है। ऐसे माहौल में यह सुधार एक नया संकट है। गिल्ड सारे सदस्य और एक्सपर्ट के साथ चर्चा करेंगे और हम अपना विरोध भी जरूर दर्ज कराएंगे।

सेंसर सर्टिफिकेट की 10 साल की मुद्दत निरस्त कर उसे स्थाई बनाने के सुधार का स्वागत है। U/A सर्टिफिकेट में कैटेगरी बढ़ाने और पायरेसी के विरुद्ध भारी दंड के प्रावधान भी अच्छे हैं, लेकिन उन पर किस तरह अमल हो पाएगा, यह समझना होगा।

फ़िल्म मेकर सुधीर मिश्रा ने इस प्रावधान का विरोध जाहिर करते हुए कहा है कि हमारे यहां अपनी स्वायत न्याय प्रणाली है ही, यदि किसी को किसी फिल्म पर आपत्ति है,तो वह कोर्ट के समक्ष जा सकता है। फिर यह प्रावधान क्यों होना चाहिए?

इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार को स्वम अपनी ही संस्था सीबीएफसी पर बिल्कुल भरोसा नही है। हम जानते है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अबाधित नही है हम सब को हमारी न्याय प्रणाली पर पूर्ण रूप से भरोसा है। फिर सरकार को स्वम को समीक्षा का अधिकार क्यों चाहिए? 

पहले ट्रिब्यूनल के तौर में एक रिड्रेसल मैकेनिज्म था। वहां एक सेवानिवृत न्यायाधीश की अध्यक्षता में सुनवाई होती थी। वह भी छीन लिया गया। उसे बहाल करना चाहिए।

फ़िल्म मेकर सुधीर मिश्रा ने कहा कि अभी पूरी इंडस्ट्री कोरोना के चलते बहुत नुकसान में है। इसमें राहत की बात तो दूर, अब इंडस्ट्री को इन सब बातों में उलझाया जा रहा है। मैं तो लंबे अरसे से कह रहा हूं कि इंडस्ट्री को पांच साल के टैक्स ब्रेक की आवश्यकता है। तभी इस देश में क्रिएटिविटी का विस्फोट होगा। लेकिन, ऐसी समीक्षा के जोखिम की स्थिति में कौन अपनी रकम फिल्म बनाने पर लगाएगा?

इस सुधार के विरूद्ध विशाल भारद्वाज और प्रीतिश नंदी जैसे प्रोड्यूसर आ चुके हैं। साउथ फिल्म इंडस्ट्री से कमल हसन ने कहा है कि हम आंख, मुंह और कान बंद करके बैठे तीन बंदर की भूमिका नहीं निभा सकते।

फिल्म मेकर प्रतीक वत्स और शिल्पा गुलाटी ने एक ऑनलाइन पिटीशन तैयार की है। इस पर फरहान अख्तर, शबाना आजमी, हंसल मेहता और अनुराग कश्यप समेत फिल्म उद्योग से जुड़े लोग और कई प्रबुद्ध लोगों ने अपनी सहमति जताई है। इस पिटीशन में 5 बातें अहम हैं।

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1-सिनेमेटोग्राफी अमेंडमेंट बिल 2021 में सीबीएफसी की भूमिका सेंसर करने वाली संस्था नही फ़िल्म सर्टीफाइड करने वाली संस्था के रूप में हो। 

2-केंद्र सरकार को फ़िल्म सेंसर सर्टिफिकेट को निरस्त करने का अधिकार नही होना चाहिए। 

3- फ़िल्म पायरेसी के लिए सजा के जो प्रावधान बताये गए उससे इस चुनौती का ठीक तरह से हल नही होगा। 

4- फ़िल्म सर्टिफिकेट अपीलेट ट्रिब्यूनल को फिर से बहाल करना चाहिए। 

5- एक्ट में जिस फ़िल्म का बजट बड़ा हो और जिसकी आमदनी थियेटर रिलीज पर निर्भर हो ऐसी फिल्म को शामिल करना चाहिए। 

दूसरी तरफ सीनियर फ़िल्म मेकर श्याम बेनेगल ने इस सुधार का स्वागत किया है। एक निजी न्यूज़ पेपर को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि आज जो बात सही लग रही है,वह 20 साल उपरांत सही न लगे। ऐसा हो सकता है इसलिए सर्टीफिकेशन स्थायी नही होना चाहिए। 

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