निष्पक्ष जांच एक मौलिक अधिकार है, बाहरी हस्तक्षेप ग़लत: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में आरोपी के खिलाफ दायर चार्जशीट और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधीक्षक (SP) को जांच अधिकारी (IO) को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि जांच निष्पक्ष होनी चाहिए, बाहरी प्रभाव से मुक्त और पूरी तरह से कानूनी ढांचे के तहत संचालित होनी चाहिए। साथ ही, यह फैसला दिया कि निष्पक्ष जांच संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है।

मामले की पृष्ठभूमि

न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा द्वारा सुनाया गया यह निर्णय 482 सीआरपीसी आवेदन संख्या 2882/2016 में आया, जिसे प्रदीप कुमार मौर्य और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के तहत दायर किया गया था। आवेदकों के खिलाफ आईपीसी की धारा 147, 323, 504 और 353 के तहत दर्ज चार्जशीट को अवैध घोषित किया गया क्योंकि इसे पुलिस अधीक्षक, सीबी-सीआईडी द्वारा दिए गए अवैध आदेश के अनुपालन में तैयार किया गया था।

मामले की विस्तृत जानकारी

मूल मामला पक्षकारों के बीच दायर आपराधिक शिकायतों की एक श्रृंखला से उत्पन्न हुआ था।

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  • शुरुआत में, आवेदकों में से एक, मोहम्मद ऐराज सिद्दीकी ने वर्ष 2009 में अपराध संख्या 24/2009 के तहत आईपीसी की धारा 147, 323, 336, 504 और 506 में प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें वर्तमान मामले के सूचक के बेटे को आरोपी बनाया गया था।
  • बाद में, जब यह मामला लंबित था, तो साल 2010 में अपराध संख्या 359/2010 के तहत आवेदकों के खिलाफ 147, 323, 504, 427, 307 और 308 आईपीसी में एक प्रतिवादी एफआईआर दर्ज कराई गई। इसमें आरोप लगाया गया कि आवेदकों ने शिकायतकर्ता पर हमला किया और उसे चोट पहुंचाई।
  • जांच के बाद, स्थानीय पुलिस ने वर्ष 2010 में अंतिम रिपोर्ट (संख्या 201/2010) दाखिल कर दी, जिसमें सबूतों के अभाव में चार्जशीट दाखिल करने की कोई आवश्यकता नहीं पाई गई।
  • इसके बाद, मामला आगे की जांच के लिए सीबी-सीआईडी को सौंप दिया गया, और 6 जून 2011 को पुलिस अधीक्षक (सीबी-सीआईडी) ने आदेश जारी कर अंतिम रिपोर्ट को रद्द कर दिया और जांच अधिकारी को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश दिया। इस आदेश के आधार पर, जांच अधिकारी ने चार्जशीट दाखिल कर दी और मजिस्ट्रेट ने मामले में संज्ञान ले लिया।
  • इस चार्जशीट से आहत होकर, आवेदकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष 482 सीआरपीसी के तहत याचिका दायर की, जिसमें चार्जशीट और संबंधित सभी कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई, यह तर्क देते हुए कि एसपी को जांच अधिकारी के विवेकाधिकार को नजरअंदाज करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
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अदालत में उठाए गए प्रमुख कानूनी प्रश्न

  1. क्या पुलिस अधीक्षक (SP) अंतिम रिपोर्ट को रद्द कर सकते हैं और चार्जशीट दाखिल करने के लिए जांच अधिकारी को निर्देश दे सकते हैं?
    • हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसपी को यह अधिकार नहीं है। जांच अधिकारी को स्वतंत्र रूप से चार्जशीट दाखिल करने का निर्णय लेना चाहिए, जो धारा 173(2) और 173(8) सीआरपीसी के तहत निर्धारित है।
  2. क्या किसी वरिष्ठ अधिकारी का हस्तक्षेप जांच प्रक्रिया में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है?
    • अदालत ने कहा कि निष्पक्ष जांच एक मौलिक एवं संवैधानिक अधिकार है, जिसे अनुच्छेद 14, 21 और 39-ए द्वारा संरक्षित किया गया है। यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी का हस्तक्षेप जांच अधिकारी के निर्णय को प्रभावित करता है, तो यह जांच की निष्पक्षता को प्रभावित करता है।
  3. क्या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आपराधिक जांच की दिशा तय कर सकते हैं?
    • सीआरपीसी की धारा 36 के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारी जांच की निगरानी कर सकते हैं लेकिन वे जांच अधिकारी को चार्जशीट दाखिल करने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। उनका कार्य केवल प्रक्रियागत अनुपालन सुनिश्चित करना होता है।
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कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने निष्पक्ष जांच के महत्व को रेखांकित करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां दीं:

  • “निष्पक्ष जांच कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर आरोपी और पीड़ित का मौलिक अधिकार है।”
  • “जांच अधिकारी को अभियोजन से संबंधित स्वतंत्र राय बनाने का विशेष अधिकार है, जिसे कोई वरिष्ठ अधिकारी बाधित नहीं कर सकता।”
  • “वरिष्ठ अधिकारियों का हस्तक्षेप जांच की पवित्रता को भंग करता है और यह आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।”
  • “यदि अवैध रूप से दायर चार्जशीट के आधार पर मुकदमा चलने दिया जाए, तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।”
  • “जांच अधिकारी के अलावा कोई अन्य अधिकारी यह तय नहीं कर सकता कि मामला अभियोजन के योग्य है या नहीं।”

उल्लेखित सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया, जिनमें शामिल हैं:

  1. State of Bihar vs. J.A.C. Saldanha (1980) 1 SCC 554
  2. Abhinandan Jha vs. Dinesh Mishra (AIR 1968 SC 117)
  3. Nirmal Singh Kohlon vs. State of Punjab (2009) 1 SCC 441
  4. H.N. Rishbud v. State of Delhi (1955 CrLJ 526)
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कोर्ट का निर्णय

अदालत ने मामले के कानूनी पक्ष का विश्लेषण करने के बाद चार्जशीट और लखनऊ के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित समस्त आपराधिक कार्यवाही को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया

मुख्य कारण:

  • एसपी के अवैध आदेश के कारण दाखिल चार्जशीट को न्यायालय ने असंवैधानिक माना।
  • चार्जशीट दाखिल करने का निर्णय केवल जांच अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
  • वरिष्ठ अधिकारियों का हस्तक्षेप आरोपी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  • अवैध आदेश के आधार पर जारी कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगी।

निष्कर्ष:
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा:
“पुलिस अधीक्षक द्वारा चार्जशीट दाखिल करने का आदेश जांच की निष्पक्षता पर सीधा प्रहार है, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 39-ए के तहत एक मौलिक अधिकार है। इस तरह का हस्तक्षेप न केवल अवैध है बल्कि यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया के लिए भी हानिकारक है। अतः यह चार्जशीट असंवैधानिक मानी जाती है।”

इस आधार पर, हाईकोर्ट ने आवेदकों की 482 सीआरपीसी याचिका स्वीकार करते हुए चार्जशीट और समस्त कार्यवाही को रद्द कर दिया

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