सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि यदि किसी वाणिज्यिक लेनदेन में पैसे चुकाने का वादा पूरा नहीं किया गया, तो वह केवल धोखाधड़ी (IPC की धारा 420) का आपराधिक मामला नहीं बनता, जब तक यह साबित न हो जाए कि लेनदेन की शुरुआत में ही आरोपी की मंशा बेईमान या धोखेबाज़ थी।
यह निर्णय न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति पामिडिघंटम श्री नरसिम्हा की खंडपीठ ने Manish बनाम State of Maharashtra and Anr. मामले में सुनाया, जो SLP (Crl) No. 10931 of 2022 से उत्पन्न हुआ आपराधिक अपील थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला अपीलकर्ता मनीष और शिकायतकर्ता नितिन (पुत्र मुरलीधर अग्रवाल) के बीच कोयले की आपूर्ति को लेकर हुए व्यावसायिक विवाद से जुड़ा है। नवंबर 2015 से जून 2017 के बीच नितिन ने मनीष को 15 दिनों की क्रेडिट शर्तों पर कोयला बेचा। शुरू में आंशिक भुगतान हुआ, लेकिन बाद में भुगतान रुक गया और ₹76.82 लाख की बकाया राशि बन गई।

जुलाई 2020 में नोटिस और बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने एक नोटरीकृत समझौता किया, जिसमें मनीष ने ₹80 लाख पांच किश्तों में चुकाने की बात मानी। केवल ₹5 लाख चुकाए गए, बाकी राशि अदा नहीं की गई।
जब पुलिस ने शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की, तो नितिन ने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत नागपुर के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट से गुहार लगाई। इसके बाद एफआईआर संख्या 80/2022 लक्षदगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई और मनीष के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 के तहत आरोप पत्र दायर किया गया।
मनीष ने इस एफआईआर को रद्द करने के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर पीठ) में याचिका दायर की, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उसे खारिज कर दिया कि प्रथम दृष्टया धोखाधड़ी का मामला बनता है।
महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित कानूनी प्रश्न थे:
- क्या यह लेनदेन केवल सिविल विवाद था या इसमें आपराधिक धोखाधड़ी का तत्व था?
- क्या लेनदेन की शुरुआत में ही आरोपी की मंशा बेईमानी की थी?
- क्या बाद में किए गए समझौते का उल्लंघन आपराधिक दायित्व उत्पन्न करता है?
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख टिप्पणियाँ
पीठ ने सिविल अनुबंध के उल्लंघन और आपराधिक धोखाधड़ी के बीच के अंतर को रेखांकित किया। Hridaya Ranjan Prasad Verma बनाम बिहार राज्य और Sarabjit Kaur बनाम पंजाब राज्य जैसे मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“केवल भुगतान का वादा पूरा न करना, अपने आप में बेईमानी की मंशा को सिद्ध नहीं करता।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
“धोखाधड़ी का मामला तब बनता है जब लेनदेन की शुरुआत में ही आरोपी ने जानबूझकर झूठे प्रतिनिधित्व से दूसरे पक्ष को संपत्ति सौंपने के लिए प्रेरित किया हो।”
IPC की धारा 415 के illustration (g) का हवाला देते हुए कहा गया:
“यदि A पैसे लेते समय वास्तव में सामान देने की मंशा रखता था और बाद में अनुबंध का उल्लंघन करता है, तो यह धोखाधड़ी नहीं बल्कि केवल सिविल उल्लंघन है।”
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में:
- मनीष एक संपन्न व्यवसायी था, जिसकी संपत्तियाँ बंधक रखी गई थीं।
- उसने 2016 तक अपने बैंक ऋण नियमित रूप से चुकाए थे, और 2018 में भी बैंक ने उसे अतिरिक्त ऋण प्रदान किया।
- रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं था कि कोयला लेनदेन की शुरुआत में वह दिवालिया या असमर्थ था।
- 2020 के समझौते के बाद कोई नई आपूर्ति नहीं हुई, इसलिए धोखा देने की कोई नई मंशा या नुकसान का कोई आधार नहीं था।
अतः कोर्ट ने कहा:
“व्यवसाय में घाटे के कारण भुगतान न कर पाना, अपराध नहीं बनता। इस आधार पर आपराधिक कानून का सहारा लेकर बकाया वसूलना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि मनीष की शुरुआत से ही धोखेबाज़ मंशा थी।
कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए आदेश दिया:
“हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया जाता है और एफआईआर संख्या 80/2022, दिनांक 11 फरवरी 2022, जो कि आईपीसी की धारा 420 के अंतर्गत लक्षदगंज पुलिस स्टेशन, नागपुर में दर्ज की गई थी, उसे रद्द किया जाता है।”
साथ ही लंबित आवेदनों का भी निस्तारण कर दिया गया।