कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम (DV Act) के तहत कार्यवाही में, यदि प्रतिवादी (आरोपी) जिरह (cross-examination) के लिए उपस्थित होने में विफल रहता है, तो केवल इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि घरेलू हिंसा की घटनाएं साबित हो गई हैं।
न्यायमूर्ति रवि वी. होसमनि की एकल पीठ ने दोहराया कि डीवी एक्ट के तहत आरोपों को गलत साबित करने की जिम्मेदारी प्रतिवादी पर नहीं होती है, बल्कि आरोप लगाने वाले को ही इसे सिद्ध करना होता है। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिसमें एक पिता को अपनी बेटी को भरण-पोषण और मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक पारिवारिक विवाद और दुखद घटनाओं की श्रृंखला से जुड़ा है। याचिकाकर्ता (पिता), श्री भास्कर रेड्डी की पत्नी की अक्टूबर 2012 में मृत्यु हो गई थी। पत्नी की मृत्यु के बाद, बच्चों (बेटी और बेटा) की नानी, श्रीमती रमादेवी ने बच्चों को अपने संरक्षण में ले लिया।
इसके बाद, नानी ने पिता के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने आरोप लगाया कि पिता ने अपनी पत्नी की हत्या की और उसे बाथरूम में गिरने की दुर्घटना का रूप दिया। इसके अलावा, पिता पर अपनी ही बेटी के साथ यौन शोषण करने का भी आरोप लगाया गया। इन आरोपों के आधार पर नानी ने बच्चों की ओर से डीवी एक्ट की धारा 12 के तहत याचिका दायर की।
मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ट्रैफिक कोर्ट-I, बेंगलुरु ने 19 जुलाई, 2023 को याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पिता को निर्देश दिया कि वह बेटी की शादी तक उसे 15,000 रुपये मासिक भरण-पोषण दे, 10 लाख रुपये का मुआवजा दे और ‘स्त्रीधन’ वापस करे। सत्र न्यायालय (Sessions Court) ने भी 28 फरवरी, 2025 को इस आदेश की पुष्टि कर दी। इसके बाद पिता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट में दलीलें: प्रतिशोध या न्याय?
पिता के वकील, श्री एस. बालकृष्णन ने तर्क दिया कि ये सभी आरोप उनकी सास (नानी) द्वारा “जवाबी कार्रवाई” (counterblast) के रूप में लगाए गए थे। उन्होंने बताया कि पत्नी की मृत्यु के बाद गहनों और संपत्ति के विवाद के कारण नानी ने उनके खिलाफ हत्या (आईपीसी की धारा 302) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत झूठे मुकदमे दर्ज कराए थे।
पिता के पक्ष ने कोर्ट के सामने निम्नलिखित तथ्य रखे:
- हत्या के मामले में पुलिस ने जांच के बाद ‘बी’ रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल की थी।
- यौन शोषण के आरोपों (POCSO मामले) में सक्षम अदालत ने 28 जनवरी, 2020 को पिता को बरी कर दिया था।
- बेटी की मेडिकल जांच में जो चोटें पाई गईं, वे उस समय की थीं जब वह अपनी नानी के पास रह रही थी।
दूसरी ओर, बेटी (प्रतिवादी) के वकील श्री हरीश एच.वी. ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने पिता के खिलाफ सही फैसला सुनाया था क्योंकि पिता जिरह (cross-examination) के लिए अदालत में पेश नहीं हुए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बेटी राहत की हकदार है और बालिग होने के बाद भी भरण-पोषण दिया जा सकता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
घरेलू हिंसा के आरोपों पर संदेह
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों की गहराई से जांच की और पाया कि निचली अदालतों के निष्कर्षों में गंभीर त्रुटियां थीं। कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि पोक्सो (POCSO) मामले की सुनवाई के दौरान बेटी ने अपने बयान में स्वीकार किया था कि “मां की मृत्यु तक… बेंगलुरु में उसका जीवन खुशहाल और सुखद था।”
इसके अलावा, गवाह के रूप में नानी (PW-1) ने भी स्वीकार किया था कि बेटी की मृत्यु से पहले उन्होंने दामाद (याचिकाकर्ता) के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। बलात्कार के आरोप वाली शिकायतें भी तब दर्ज कराई गईं जब पिता को पहले मामले में जमानत मिल गई थी।
कोर्ट ने कहा कि चूंकि पिता को POCSO मामले में बरी कर दिया गया है और हत्या के मामले में पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट लगा दी है, इसलिए घरेलू हिंसा के आरोप गंभीर संदेह के घेरे में आ जाते हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ये सामग्रियां घरेलू हिंसा के आरोपों पर गंभीर संदेह पैदा करती हैं… इसके अलावा, यौन शोषण के बारे में दी गई दलीलों में तारीख और जगह जैसे विवरणों का स्पष्ट अभाव है।”
जिरह और सबूत का भार (Burden of Proof)
निचली अदालतों ने मुख्य रूप से इस आधार पर पिता के खिलाफ फैसला सुनाया था कि वह जिरह के लिए पेश नहीं हुए। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया:
“अंत में, डीवी एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो प्रतिवादी (आरोपी) पर यह जिम्मेदारी डालता हो कि वह घरेलू हिंसा के आरोपों को गलत साबित करे। इसलिए, केवल जिरह के लिए प्रतिवादी का उपस्थित न होना घरेलू हिंसा की घटनाओं को स्थापित मानने का आधार नहीं हो सकता।”
हाईकोर्ट ने माना कि जब रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें बरी होने का फैसला और गवाहों के खुद के बयान शामिल हैं, आरोपों का खंडन कर रही हो, तो केवल जिरह में अनुपस्थिति के आधार पर सजा देना कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को “विकृत” (perverse) करार दिया।
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) को स्वीकार करते हुए मजिस्ट्रेट कोर्ट और सत्र न्यायालय द्वारा पारित भरण-पोषण और मुआवजे के आदेशों को रद्द कर दिया।
केस डिटेल:
केस टाइटल: श्री भास्कर रेड्डी बनाम सुश्री रोशनी
केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन संख्या 528 ऑफ 2025
कोरम: न्यायमूर्ति रवि वी. होसमनि

