दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि शिक्षित और स्वतंत्र वयस्कों के बीच असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने यह टिप्पणी एक महिला द्वारा अपने पूर्व साथी पर दर्ज दुष्कर्म और जातिसूचक टिप्पणी के मामले को रद्द करते हुए की। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्ष चार साल तक सहमति से संबंध में थे और रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जो झूठे विवाह के वादे या जबरदस्ती का संकेत दे।
प्रार्थिनी (महिला) ने अपने पूर्व साथी पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था, यह कहते हुए कि उसने विवाह का झूठा वादा कर उससे शारीरिक संबंध बनाए। साथ ही, उसने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी ने उसके साथ जातिसूचक टिप्पणी की और अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कराया।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में लोग आमतौर पर प्रेम संबंधों की शुरुआत इस उम्मीद के साथ करते हैं कि वह विवाह में परिवर्तित होंगे, लेकिन हर रिश्ता इस परिणाम तक नहीं पहुंचता और इसका असफल होना कानून का मामला नहीं बन जाता।
“एक शिक्षित और स्वतंत्र वयस्क को यह समझना चाहिए कि किसी रिश्ते के विफल हो जाने मात्र से आपराधिक मामला नहीं बनता। कानून को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए नहीं बुलाया जा सकता,” कोर्ट ने कहा।
चार साल तक चले रिश्ते की वॉट्सऐप बातचीत को देखने के बाद न्यायालय ने पाया कि यह रिश्ता आपसी सहमति और स्नेहपूर्ण था। बातचीत में घटना के बाद भी संवाद जारी था, जिससे यह नहीं प्रतीत होता कि कोई दबाव या झूठा वादा था।
जातिगत टिप्पणी के आरोप पर भी कोर्ट ने पाया कि उपलब्ध रिकॉर्ड और चैट में ऐसा कुछ नहीं था जिससे लगे कि आरोपी ने जाति के आधार पर कोई अपमानजनक व्यवहार किया या अपराध जातिगत कारणों से प्रेरित था।
“व्हाट्सऐप चैट में कोई भी जातिसूचक टिप्पणी या जातिगत दुर्भावना का संकेत नहीं है। आरोपी ने प्रार्थिनी से सामान्य और सम्मानजनक भाषा में बात की थी,” कोर्ट ने कहा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि:
“जब कोई रिश्ता टूटता है तो कुछ लोग इसे परिपक्वता से स्वीकार करते हैं, लेकिन कुछ मामलों में भावनात्मक आघात, निराशा या आहत भावनाएं बाद के निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं।”
कोर्ट ने माना कि मामला आपसी सहमति से बने संबंध का था, जो बाद में टूट गया, और रिकॉर्ड में कोई ऐसा साक्ष्य नहीं है जो विवाह का झूठा वादा या जबरदस्ती साबित करता हो। इसलिए, प्राथमिकी को निराधार मानते हुए रद्द कर दिया गया।
“ऐसे मामलों में संवेदनशीलता, संयम और दोनों व्यक्तियों की स्वतंत्रता और चुनाव के अधिकार का सम्मान जरूरी है,” कोर्ट ने कहा।

