“डिस्पैच सेक्शन का दरवाजा” सार्वजनिक दृश्य के दायरे में: कर्नाटक हाईकोर्ट ने फैक्ट्री मालिकों के खिलाफ दर्ज SC/ST एक्ट का मामला रद्द करने से किया इनकार

कर्नाटक हाईकोर्ट की धारवाड़ पीठ ने तीन फैक्ट्री मालिकों द्वारा दायर उस आपराधिक याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने कर्मचारियों के खिलाफ जातिसूचक गालियों के इस्तेमाल के आरोप में दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई घटना निजी फैक्ट्री परिसर के भीतर भी होती है, तो उसे ‘सार्वजनिक दृश्य’ (Public View) माना जा सकता है यदि वह अन्य कर्मचारियों के लिए सुलभ या दृश्यमान हो।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्याम मेहता, बिमल मेहता और नीपा मेहता—जो “स्विम्स टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड फैक्ट्री” के मालिक हैं—ने हाईकोर्ट में Cr.P.C. की धारा 482 (BNSS की धारा 528) के तहत याचिका दायर कर क्राइम नंबर 0146/2024 को रद्द करने की मांग की थी। गोकुल रोड पुलिस स्टेशन, हुबली में दर्ज इस FIR में IPC की धारा 504 और 584 के साथ-साथ SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत आरोप लगाए गए थे।

शिकायतकर्ता यल्लप्पा करिगप्पा हरिजन, जो 20 वर्षों से फैक्ट्री में काम कर रहे थे, ने आरोप लगाया कि 6 अप्रैल 2024 को मालिक डिस्पैच सेक्शन के दरवाजे पर आए और उन पर तथा एक अन्य सहयोगी पर किसी महादेव खांडेकर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का दबाव बनाया। उनके इनकार करने पर, मालिकों ने कथित तौर पर जातिसूचक गालियों का इस्तेमाल किया, उनकी आजीविका का अपमान किया और उन्हें नौकरी से निकालने व चोरी के झूठे मामले में फंसाने की धमकी दी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील श्री श्रीधर प्रभु ने तर्क दिया कि यह शिकायत “अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग” है और इसे चल रहे ट्रेड यूनियन विवाद के कारण प्रेरित होकर दर्ज कराया गया है। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:

  • विलंब: घटना अप्रैल में हुई जबकि FIR अक्टूबर में दर्ज कराई गई, जो 6 महीने की देरी है।
  • निजी परिसर: कथित घटना फैक्ट्री के डिस्पैच सेक्शन के भीतर हुई, जो याचिकाकर्ताओं के अनुसार “सार्वजनिक स्थान” या “सार्वजनिक दृश्य” के दायरे में नहीं आता।
  • दुर्भावनापूर्ण इरादा: शिकायत “वीयर बीडीके वाल्व्स वर्कर्स यूनियन” द्वारा हड़ताल का नोटिस दिए जाने के बाद दर्ज की गई, जिससे इसके प्रतिशोधात्मक होने का संकेत मिलता है।
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दूसरी ओर, शिकायतकर्ता और हाईकोर्ट सरकारी वकील (HCGP) ने तर्क दिया कि मामले में प्रथम दृष्टया (prima facie) अपराध बनता है। उन्होंने कहा कि देरी के कारणों और आरोपों की सत्यता का फैसला ट्रायल के दौरान होना चाहिए, न कि FIR रद्द करने के चरण में।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस हंचाते संजीवकुमार ने SC/ST एक्ट के तहत “सार्वजनिक स्थान” (Public Place) और “सार्वजनिक दृश्य” (Public View) के बीच के अंतर का विश्लेषण किया।

‘सार्वजनिक दृश्य’ पर हाईकोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने पाया कि फैक्ट्री का डिस्पैच सेक्शन और उसका दरवाजा सभी कर्मचारियों के आने-जाने के लिए सुलभ है और यह कोई एकांत स्थान नहीं है।

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“सार्वजनिक दृश्य का अर्थ अनिवार्य रूप से यह नहीं है कि इसे किसी राहगीर द्वारा देखा जाना चाहिए; यदि उस स्थान पर कर्मचारी मौजूद हैं, तो उन कर्मचारियों को भी जनता का सदस्य माना जाना चाहिए।”

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के करुप्पुदयर बनाम राज्य और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि एक निजी स्थान भी ‘सार्वजनिक दृश्य’ के दायरे में आ सकता है यदि वहां जनता के सदस्य (रिश्तेदारों के अलावा अन्य कर्मचारी) मौजूद हों या घटना के गवाह बन सकें।

FIR में देरी पर टिप्पणी: हाईकोर्ट ने कहा कि 6 महीने की देरी FIR रद्द करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। जस्टिस संजीवकुमार ने टिप्पणी की कि शिकायतकर्ता एक “गरीब कामगार” होने के नाते नौकरी खोने के डर में हो सकता था।

“इन परिस्थितियों में, शिकायतकर्ता एक गरीब कामगार होने के कारण याचिकाकर्ताओं/आरोपियों का सामना करने की स्थिति में नहीं रहा होगा… नौकरी खत्म होने की आशंका बनी रही होगी।”

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ट्रेड यूनियन विवाद पर रुख: हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि हड़ताल के नोटिस के कारण शिकायत स्वतः ही अमान्य हो जाती है। हाईकोर्ट ने कहा कि हड़ताल का मुद्दा और कामगार की व्यक्तिगत शिकायत स्वतंत्र रूप से विचारणीय हैं।

“क्या ट्रेड यूनियन ने शिकायतकर्ता को शिकायत दर्ज करने के लिए उकसाया है… यह एक विवादित तथ्य है और ट्रायल का विषय है, जिसका फैसला इस स्तर पर नहीं किया जा सकता।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायत के आरोपों को देखते हुए प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व मौजूद हैं। जस्टिस संजीवकुमार ने जोर देकर कहा कि हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग बहुत कम और केवल “दुर्लभतम मामलों” में ही किया जाना चाहिए। मामले में ट्रायल के लिए पर्याप्त आधार पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

केस विवरण (Case Details)

  • केस टाइटल: श्याम मेहता बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 100213 ऑफ 2025
  • बेंच: जस्टिस हंचाते संजीवकुमार
  • दिनांक: 2 अप्रैल, 2026

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