दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल बेटी को वसीयत (Will) से बाहर रखना अपने आप में कोई संदेहजनक परिस्थिति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक पति या पत्नी द्वारा अपनी पूरी संपत्ति अपने जीवनसाथी के नाम करना एक स्वाभाविक कृत्य है, जिसका उद्देश्य अक्सर जीवित जीवनसाथी के सम्मान और देखभाल को सुनिश्चित करना होता है।
जस्टिस अमित बंसल की पीठ ने बेटी द्वारा दायर विभाजन के मुकदमे (Partition Suit) को खारिज कर दिया और साथ ही पिता की वसीयत को सही ठहराते हुए बेटे और पोते के पक्ष में प्रोबेट (Probate) प्रदान किया। कोर्ट ने पाया कि वादी (बेटी) अपने माता-पिता की वसीयतों के आसपास किसी भी संदिग्ध परिस्थिति को साबित करने में विफल रही।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला दो जुड़े हुए मामलों पर आया: कांता सेठी द्वारा दायर विभाजन का मुकदमा (CS(OS) 2159/2002) और सुदेश गुलाटी व संजय गुलाटी द्वारा दायर प्रोबेट याचिका (TEST.CAS. 90/2014)।
वादी कांता सेठी ने अपनी दिवंगत मां श्रीमती कृष्णा वंती और पिता श्री हंस राज गुलाटी की संपत्तियों के विभाजन की मांग की थी। उनका दावा था कि 2002 में उनकी मां की मृत्यु बिना वसीयत किए (intestate) हुई थी, इसलिए कृष्णा मार्केट, कालकाजी स्थित संपत्ति में उनका हिस्सा बनता है। बाद में, 2005 में पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी याचिका में संशोधन कर पिता की एच-61, कालकाजी स्थित संपत्ति पर भी दावा किया।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों (भाई सुदेश गुलाटी और अन्य) ने दो वसीयतों के आधार पर इस दावे का विरोध किया:
- 12 अक्टूबर 2001 की वसीयत: मां श्रीमती कृष्णा वंती द्वारा निष्पादित, जिसमें उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति अपने पति श्री हंस राज गुलाटी को दे दी थी।
- 30 मई 2003 की वसीयत: पिता श्री हंस राज गुलाटी द्वारा निष्पादित, जिसमें उन्होंने अपनी संपत्ति अपने बेटे सुदेश और पोते संजय को दी थी और अपनी बेटियों को स्पष्ट रूप से बेदखल किया था।
पक्षों की दलीलें
वादी ने मां की 2001 की वसीयत की प्रमाणिकता को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी मां, जो 83-84 वर्ष की थीं और बिस्तर पर थीं, आमतौर पर अंगूठे का निशान लगाती थीं, लेकिन वसीयत पर हिंदी में हस्ताक्षर थे। उन्होंने यह भी कहा कि वसीयत के दूसरे गवाह से पूछताछ नहीं की गई। पिता की 2003 की वसीयत के बारे में, वादी और अन्य बहनों ने आरोप लगाया कि 92 वर्ष की आयु और खराब स्वास्थ्य के कारण यह संदेहजनक परिस्थितियों में बनाई गई थी। उन्होंने यह भी दावा किया कि एक बाद की वसीयत, जिसमें संपत्ति को बराबर बांटा गया था, उसे सुदेश गुलाटी ने एक पारिवारिक समारोह में फाड़ दिया था।
प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि दोनों वसीयतें असली हैं। मां की वसीयत से पिता पूर्ण स्वामी बन गए थे, और बाद में पिता ने कानूनी रूप से अपनी संपत्ति बेटे और पोते को वसीयत कर दी। उन्होंने “फटी हुई वसीयत” के अस्तित्व से इनकार किया और कहा कि विभाजन का मुकदमा इसलिए भी चलने योग्य नहीं है क्योंकि वादी ने अपनी पांच अन्य बहनों को पक्षकार नहीं बनाया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
1. आवश्यक पक्षकारों को शामिल न करना (Non-Joinder of Necessary Parties) कोर्ट ने पाया कि वादी ने अपनी पांच बहनों को पक्षकार नहीं बनाया, जो कानूनी वारिस भी थीं। सुप्रीम कोर्ट के कनकरत्नम्मल बनाम वी.एस. लोगनाथ मुदलियार और दिल्ली हाईकोर्ट के शीतल सूरी बनाम सुखदेव सिंह के फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि विभाजन के मुकदमे में सभी सह-हिस्सेदार आवश्यक पक्षकार होते हैं।
“वादी अन्य कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाने में विफल रही है… इसलिए, वर्तमान मुकदमा आवश्यक पक्षकारों के गैर-संयोजन (non-joinder) के कारण दोषपूर्ण है।”
2. मां की वसीयत (2001) की वैधता कोर्ट ने मां की वसीयत को चुनौती देने वाली दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने नोट किया कि गवाह (सुदेश गुलाटी) की गवाही कि वसीयतकर्ता हिंदी पढ़ और लिख सकती थीं, का कोई खंडन नहीं किया गया। कोर्ट ने खजान सिंह बनाम स्टेट मामले का हवाला देते हुए कहा कि पति के पक्ष में वसीयत करना स्वाभाविक है।
“हमारे समाज में पति या पत्नी द्वारा अपनी संतान को छोड़कर एक-दूसरे के पक्ष में अपनी पूरी संपत्ति की वसीयत करना अस्वाभाविक या असामान्य नहीं है। ऐसा अक्सर परिवार में सौहार्द बनाए रखने और कभी-कभी दूसरे की मृत्यु के बाद जीवित जीवनसाथी की उचित देखभाल, स्थिति और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए किया जाता है।”
3. पिता की वसीयत (2003) और बेटियों की बेदखली कोर्ट ने पिता की वसीयत को असली माना, जिसकी पुष्टि एक स्वतंत्र गवाह और सब-रजिस्ट्रार की गवाही से हुई। बेटियों को बेदखल करने के मुद्दे पर, कोर्ट ने वसीयत के उस विशिष्ट खंड का उल्लेख किया जहां पिता ने कहा था कि उन्होंने अपनी बेटियों की शादियों पर पर्याप्त खर्च किया है। हरि सिंह और अन्य बनाम स्टेट मामले का सहारा लेते हुए, जस्टिस बंसल ने टिप्पणी की:
“वसीयत के निष्पादन की वास्तविकता को परखते समय, कोर्ट के लिए यह देखने का कोई स्थान नहीं है कि वसीयतकर्ता द्वारा किया गया वितरण उनके सभी बच्चों के लिए निष्पक्ष और समान था या नहीं।”
4. “फटी हुई वसीयत” का सिद्धांत कोर्ट ने वादी के इस दावे को खारिज कर दिया कि बेटे द्वारा बाद की वसीयत फाड़ दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि किसी भी आपत्तिकर्ता ने कथित फटी हुई वसीयत को देखा या पढ़ा नहीं था, और उनके बयान सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे।
5. प्रोबेट में परिसीमा (Limitation) आपत्तिकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रोबेट याचिका वसीयतकर्ता की मृत्यु के सात साल बाद दायर की गई थी, इसलिए यह समय-बाधित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार एक सतत अधिकार है। कोर्ट ने माना कि आवेदन करने का अधिकार 2009 में उत्पन्न हुआ जब वादी ने पिता की संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए अपनी याचिका में संशोधन किया था। इसलिए, 2012 में दायर याचिका तीन साल की अवधि के भीतर थी।
फैसला
दिल्ली हाईकोर्ट ने कांता सेठी द्वारा दायर विभाजन के मुकदमे (CS (OS) 2159/2002) को खारिज कर दिया और सुदेश गुलाटी व संजय गुलाटी की प्रोबेट याचिका (TEST.CAS. 90/2014) को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने 30 मई 2003 की वसीयत का प्रोबेट याचिकाकर्ताओं के पक्ष में जारी करने का आदेश दिया।
केस टाइटल: कांता सेठी बनाम हंस राज और अन्य (CS(OS) 2159/2002) और सुदेश गुलाटी व अन्य बनाम स्टेट व अन्य (TEST.CAS. 90/2014)

