भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में यह स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी को यदि सेवा से “सेवानिवृत्ति लाभों सहित” हटाया गया है, तो वह केवल तभी पेंशन का हकदार होगा जब वह संबंधित पेंशन विनियमों के तहत पात्र हो। यह फैसला UCO Bank & Anr. बनाम विजय कुमार हांडा (सिविल अपील संख्या 5922/2024) मामले में आया है, जिसे न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने पारित किया।
मामला क्या था?
विजय कुमार हांडा, जो कि यूको बैंक में क्लर्क थे, पर 1998 में बैंक परिसर में एक अन्य अधिकारी पर हमला करने का आरोप लगा था। उन्हें दिसंबर 1999 में गंभीर कदाचार का दोषी पाए जाने पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। हालांकि, अपीलीय प्राधिकरण ने सजा को संशोधित करते हुए उन्हें “सेवा से हटाने” की सजा दी, जिससे वे अंतिम लाभ (टर्मिनल बेनिफिट्स) के पात्र बन गए और यह स्पष्ट किया गया कि यह सजा भविष्य की नौकरी के लिए अयोग्यता नहीं माने जाएगी।
बाद में श्रम न्यायालय ने हांडा की बहाली का आदेश दिया, लेकिन पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उस निर्णय को रद्द कर दिया और बैंक की मूल सजा को बहाल कर दिया। 2014 में हांडा ने पेंशन के भुगतान के लिए याचिका दायर की, जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया। बैंक की डिवीजन बेंच में अपील भी खारिज हो गई, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

कानूनी प्रश्न
मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या ऐसे कर्मचारी, जिन्हें द्विपक्षीय समझौते की धारा 6(b) के तहत “सेवानिवृत्ति लाभों सहित सेवा से हटाया” गया है, वे UCO बैंक (कर्मचारी) पेंशन विनियम, 1995 के तहत पेंशन के पात्र माने जाएंगे, जबकि वे गंभीर कदाचार के दोषी हैं।
बैंक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कविता पाहुजा ने दलील दी कि पेंशन विनियम की धारा 22(1) के अनुसार, सेवा से हटाए गए कर्मचारी पेंशन के लिए अयोग्य हैं और द्विपक्षीय समझौता पेंशन विनियमों को दरकिनार नहीं कर सकता।
वहीं, कर्मचारी ने तर्क दिया कि अपीलीय प्राधिकरण का आदेश अंतिम था और उसने समय पर पेंशन विकल्प जमा कर दिया था। साथ ही, उसने न्यूनतम सेवा अवधि भी पूरी कर ली थी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने Bank of Baroda बनाम एस.के. कूल (2014) मामले में दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि द्विपक्षीय समझौते की धारा 6(b) और पेंशन विनियमों की धारा 22 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा:
“ऐसे कर्मचारी जो अन्यथा पेंशन विनियमों के तहत सेवानिवृत्ति लाभों के पात्र हैं, यदि उन्हें सेवा से हटाने की सजा दी जाती है लेकिन सेवानिवृत्ति लाभों सहित, तो वे उन लाभों के हकदार होंगे।”
न्यायालय ने यह भी कहा कि अपीलीय प्राधिकरण का आदेश कभी चुनौती नहीं दी गई और कर्मचारी ने समय रहते पेंशन विकल्प भी जमा किया। इसलिए हाईकोर्ट के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
फैसले की मुख्य टिप्पणी:
“ऐसे कर्मचारी जो अन्यथा सेवानिवृत्ति लाभों के पात्र हैं, यदि उन्हें सेवा से हटाने की सजा दी जाए परंतु सेवानिवृत्ति लाभों सहित, तो वे उन लाभों के हकदार होंगे… यही वह व्याख्या है जो दोनों प्रावधानों में सामंजस्य बैठा सकती है।” — न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान, पैरा 21।