सेवा विधि में प्रक्रिया की निष्पक्षता को सुदृढ़ करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी न्यायिक प्राधिकरण द्वारा निर्धारित समय-सीमा के बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही जारी रखी जाती है, और उसके लिए कोई समयवृद्धि नहीं ली जाती, तो इससे “पक्षपात की आशंका” उत्पन्न हो सकती है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में कार्यवाही को रोककर समयवृद्धि के लिए आवेदन देना नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के हितों में संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्र की खंडपीठ ने यह निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राम प्रकाश सिंह के विरुद्ध दायर अपील को खारिज करते हुए सुनाया। यह अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्णय के विरुद्ध दायर की गई थी जिसमें हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य लोक सेवा अधिकरण (State Public Services Tribunal) के फैसले को बरकरार रखा था, जिसने सिंह पर लगाए गए दंड को रद्द कर दिया था।
मामला क्या था?
राम प्रकाश सिंह जिला पंचायत, कुशीनगर में सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2004-05 में उनके खिलाफ गबन के आरोप लगे। एक ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर जांच शुरू हुई और दिनांक 26 जुलाई 2010 को उन्हें बर्खास्त कर ₹10.25 लाख की वसूली का आदेश पारित किया गया। इस आदेश को सिंह ने चुनौती दी और 23 जनवरी 2014 को ट्रिब्यूनल ने यह आदेश प्रक्रिया संबंधी खामियों के आधार पर निरस्त कर दिया।
ट्रिब्यूनल ने राज्य सरकार को उत्तर देने के चरण से कार्यवाही पुनः आरंभ करने के लिए तीन महीने का समय दिया। लेकिन अप्रैल 2014 में यह समय समाप्त होने के बाद बिना समयवृद्धि मांगे, राज्य ने 24 मार्च 2015 को एक नया आदेश जारी किया जिसमें सिंह की पेंशन 5 वर्षों के लिए 5% तक घटाई गई और पुनः वसूली का निर्देश दिया गया।
इस नए आदेश को भी सिंह ने चुनौती दी, जिसे ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि न तो उन्हें जांच प्रतिवेदन की प्रति दी गई और न ही समयवृद्धि ली गई—जो कि प्रक्रिया का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने भी ट्रिब्यूनल के फैसले को सही ठहराया, जिसके विरुद्ध राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा की गई प्रक्रियागत चूकों की कड़ी आलोचना की। न्यायालय ने कहा:
“आपत्ति के बावजूद कार्यवाही जारी रखना और बिना समयवृद्धि के ऐसा करना पक्षपात की आशंका उत्पन्न कर सकता है। अतः कार्यवाही रोक कर, आवेदन पर आदेश की प्रतीक्षा करते हुए समयवृद्धि लेना दोनों पक्षों के हित में उचित कदम होगा।”
न्यायालय ने पाया कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 9(4) का उल्लंघन हुआ है क्योंकि जांच में कोई मौखिक साक्ष्य नहीं लिया गया, दस्तावेजों को प्रमाणित नहीं किया गया, और प्रतिवादी को जांच प्रतिवेदन की प्रति भी नहीं दी गई।
पूर्व निर्णयों का उल्लेख
न्यायालय ने Managing Director, ECIL v. B. Karunakar और State Bank of Patiala v. S.K. Sharma मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जांच प्रतिवेदन देना एक अनिवार्य प्रक्रिया है और इसका उल्लंघन पूरी कार्यवाही को अमान्य बना सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “पूर्वाग्रह” साबित करने का बोझ तब नहीं लगाया जा सकता जब नियम स्वयं ही अनिवार्य हो।
निर्णय
राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें सिंह की सेवा-सम्बंधी सभी सुविधाओं को बहाल करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने कहा कि ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित समय सीमा समाप्त होने के बाद अनुमति लिए बिना कार्यवाही जारी रखना अवैध और कर्मचारी के अधिकारों के विरुद्ध है।
प्रकरण शीर्षक: State of Uttar Pradesh through Principal Secretary, Department of Panchayati Raj, Lucknow vs. Ram Prakash Singh, Civil Appeal No. 14724 of 2024