बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पुणे के एक किसान को दहेज मांगने और शारीरिक उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया है। यह फैसला निचली अदालतों के निर्णय को पलटते हुए सुनाया गया। इस 33 वर्षीय व्यक्ति को पहले दहेज निषेध अधिनियम सहित कई धाराओं के तहत दोषी ठहराया गया था।
न्यायमूर्ति शिवकुमार डीगे ने स्पष्ट किया कि शादी के समय चांदी की थाली में खाना न परोसे जाने को लेकर आरोपी की नाराजगी को दहेज की मांग नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा करने के बाद कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि कथित मारपीट का संबंध किसी दहेज की मांग से था।
यह मामला आरोपी की पत्नी, जो कि एक सरकारी क्लर्क हैं, की शिकायत पर आधारित था। उन्होंने आरोप लगाया था कि उनके पति और ससुरालवालों ने चांदी की थालियां, सोने की अंगूठियां और अन्य कीमती वस्तुएं मांगने को लेकर उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। अभियोजन ने एक घटना का भी उल्लेख किया, जिसमें महिला को कथित रूप से उसके पति ने इतनी बुरी तरह मारा कि वह बेहोश हो गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। मेडिकल रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती बताई गई।

हालांकि, बचाव पक्ष के वकील अमित ईचम और चैतन्य पुरंकार ने तर्क दिया कि मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों की गवाही में कई विरोधाभास हैं। उन्होंने आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया बताया और यह भी कहा कि अभियोजन के पास कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था।
न्यायमूर्ति डीगे ने अपने फैसले में यह कहा कि दहेज से संबंधित आरोपों और क्रूरता के मामलों में ठोस सबूत होना बेहद आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि कथित घटना के बाद पति-पत्नी ने एक साथ शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत किया, जिससे यह प्रतीत होता है कि दहेज की कोई निरंतर मांग नहीं थी।
इस व्यक्ति को पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने दो साल की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे सेशंस कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। अब बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले से आरोपी को बड़ी राहत मिली है, जो वर्षों से इन आरोपों के चलते कानूनी लड़ाई लड़ रहा था।