दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि जब किसी आपराधिक मामले में अंतिम बहस पूरी हो चुकी हो और फैसला सुरक्षित कर लिया गया हो, तो उस मामले का निर्णय वही जज सुनाने के लिए बाध्य होता है जिसने बहस सुनी है, भले ही उसका स्थानांतरण हो गया हो। ऐसे मामलों में उत्तराधिकारी न्यायाधीश द्वारा दोबारा अंतिम बहस कराने का निर्देश कानून के अनुरूप नहीं है।
यह फैसला दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने दिया, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा ने की।
मामला क्या था
याचिकाकर्ता पार्वेश मान उर्फ सागर मान, एफआईआर संख्या 207/2019 में मुख्य आरोपी हैं, जो विशेष सेल, दिल्ली द्वारा दर्ज की गई थी। यह मामला महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम, 1999 (MCOCA) की धारा 3 और 4 के तहत दर्ज किया गया था।
चार्जशीट 17 जुलाई 2020 को दाखिल की गई। लंबी सुनवाई के बाद अभियोजन साक्ष्य 15 अक्टूबर 2024 को समाप्त हुए। इसके बाद सभी आरोपियों और राज्य की ओर से अंतिम बहस, प्रतिवाद सहित, 4 जुलाई 2025 को पूरी हुई। ट्रायल कोर्ट ने उसी दिन फैसला सुरक्षित रख लिया और 30 जुलाई 2025 को निर्णय सुनाने की तारीख तय की।
हालांकि, इसके बाद कई बार मामला केवल फैसले के लिए सूचीबद्ध होता रहा।
फैसले में देरी और स्थानांतरण
7 नवंबर 2025 को ट्रायल कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश फैसला सुनाने के लिए तैयार थे, लेकिन आरोपी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए थे। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी अगली तारीख पर शारीरिक रूप से पेश किए जाएं और 28 नवंबर 2025 की तारीख तय की गई।
इससे पहले कि अगली तारीख आती, 18 नवंबर 2025 को संबंधित न्यायाधीश का प्रशासनिक आदेश के तहत स्थानांतरण हो गया।
28 नवंबर 2025 को मामला उत्तराधिकारी न्यायाधीश के समक्ष आया, जिन्होंने यह कहते हुए कि अंतिम बहस उनके समक्ष नहीं हुई थी, पूरे मामले में दोबारा अंतिम बहस कराने का आदेश दे दिया।
याचिकाकर्ता की दलील
याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में दलील दी कि अंतिम बहस पूरी हो चुकी थी और फैसला पहले ही सुरक्षित कर लिया गया था। इसके अलावा, दिल्ली हाईकोर्ट की प्रशासनिक स्थानांतरण सूची में स्पष्ट निर्देश थे कि स्थानांतरित न्यायिक अधिकारी अपने द्वारा सुरक्षित रखे गए फैसले दो से तीन सप्ताह के भीतर अवश्य सुनाएंगे।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि वह पांच वर्षों से अधिक समय से न्यायिक हिरासत में है और इस स्तर पर दोबारा बहस कराना गंभीर अन्याय और अनावश्यक देरी का कारण बनेगा।
राज्य का पक्ष
राज्य की ओर से कहा गया कि स्थानांतरित न्यायाधीश को कुछ स्पष्टीकरण जांच अधिकारी से लेने थे, जो स्थानांतरण के बाद संभव नहीं था। इसी कारण मामला उत्तराधिकारी न्यायाधीश को सौंपा गया और दोबारा बहस का निर्देश दिया गया।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का विस्तृत परीक्षण करते हुए कहा कि मामला लगभग पांच महीनों तक केवल फैसले के लिए सूचीबद्ध रहा। 7 नवंबर 2025 को न्यायाधीश फैसला सुनाने के लिए पूरी तरह तैयार थे और निर्णय केवल इसलिए टल गया क्योंकि आरोपी शारीरिक रूप से अदालत में मौजूद नहीं थे।
अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में किसी प्रकार के स्पष्टीकरण की आवश्यकता होती, तो मामला इतने लंबे समय तक केवल फैसले के लिए सूचीबद्ध नहीं किया जाता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि स्थानांतरण आदेशों के साथ जारी निर्देश बाध्यकारी थे और उनका उद्देश्य यही था कि स्थानांतरण के कारण सुरक्षित फैसलों में देरी न हो।
अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि अंतिम बहस के बाद दोबारा सुनवाई कराना न केवल न्यायिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डालता है, बल्कि हिरासत में बंद आरोपी के लिए गंभीर मानसिक और संवैधानिक क्षति का कारण बनता है।
अदालत का अंतिम आदेश
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिस न्यायाधीश ने अंतिम बहस सुनी और फैसला सुरक्षित किया था, वही उस मामले में निर्णय सुनाने के लिए उत्तरदायी हैं।
अदालत ने निर्देश दिया कि सत्र वाद संख्या 143/2020 को पटियाला हाउस कोर्ट से स्थानांतरित कर उस न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाए, जो वर्तमान में कड़कड़डूमा कोर्ट में फैमिली कोर्ट-02 के न्यायाधीश के रूप में पदस्थ हैं, ताकि वे केवल फैसले का उच्चारण कर सकें।
साथ ही, उत्तराधिकारी न्यायाधीश द्वारा अंतिम बहस दोबारा कराने का आदेश रद्द कर दिया गया और तय की गई सभी बहस की तारीखें निरस्त कर दी गईं।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि निर्णय दो से तीन सप्ताह के भीतर सुनाया जाए।

