दिल्ली हाईकोर्ट ने आपसी समझौते के आधार पर मारपीट के एक मामले में दर्ज FIR को रद्द करते हुए दिल्ली पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने शिकायतों (Complaints) में पुलिस अधिकारियों द्वारा अपनी तरफ से कुछ विशिष्ट वाक्यांश जोड़ने की प्रथा को “कानून का घोर दुरुपयोग” बताया है, जिसकी पुष्टि शिकायतकर्ताओं द्वारा नहीं की जाती है।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ पुलिस स्टेशन तिमारपुर में दर्ज FIR संख्या 349/2025 को रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह FIR भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 126(2) (सदोष अवरोध), 74 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग), और 3(5) (सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने में कई व्यक्तियों द्वारा किया गया कार्य) के तहत दर्ज की गई थी।
हाईकोर्ट ने पार्टियों के बीच हुए समझौते के बाद याचिका को स्वीकार करते हुए FIR रद्द कर दी। हालांकि, कोर्ट ने FIR में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा पर कड़ा संज्ञान लिया और पुलिस उपायुक्त (DCP) को निर्देश दिया कि यह सुनिश्चित किया जाए कि पुलिस अधिकारी शिकायतों में “मनगढ़ंत बातें” (Conjured averments) न जोड़ें।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह मामला प्रतिवादी संख्या 2 (शिकायतकर्ता) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से उत्पन्न हुआ था, जो पेशे से एक इवेंट मैनेजर हैं। FIR के अनुसार, घटना तब हुई जब याचिकाकर्ता तेनजिन योटेन और एक अन्य व्यक्ति ने कथित तौर पर नशे की हालत में शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की और उसे नाचने के लिए कहा।
FIR दर्ज होने के बाद, पार्टियों ने 03.12.2025 को आपस में समझौता कर लिया। इसके बाद, याचिकाकर्ताओं ने कार्यवाही को रद्द करने के लिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (पूर्व में CrPC की धारा 482) के साथ पठित भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दलीलें और समझौता
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अपने वकील श्री राजीव कुमार और सुश्री प्रिया सिंह के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) भी अपने वकील श्री जितेंद्र तोमर के साथ मौजूद थीं।
शिकायतकर्ता ने कोर्ट के समक्ष कहा कि उन्होंने याचिकाकर्ताओं के साथ स्वेच्छा से और बिना किसी डर या दबाव के मामले को सुलझा लिया है। उन्होंने पुष्टि की कि उन्हें FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही को रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं है। राज्य की ओर से स्थायी वकील (आपराधिक) श्री संजय लाओ ने पक्ष रखा।
कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण
याचिका पर विचार करते हुए, जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़ी FIR में अक्सर पाई जाने वाली शब्दावली पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने एक पैटर्न पर गौर किया जहां पुलिस द्वारा शिकायतों में कुछ विशिष्ट हिंदी वाक्यांश जोड़ दिए जाते हैं, जो शायद पीड़ितों द्वारा नहीं कहे गए होते।
कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि धारा 354 के तहत हर FIR में आमतौर पर ‘हाथ मारा’ शब्द लिखा जा रहा है, जिसका समर्थन शिकायतकर्ता द्वारा नहीं किया जाता है। यह कानून का घोर दुरुपयोग है और पुलिस थानों के स्तर पर आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है।”
(नोट: IPC की धारा 354, BNS की धारा 74 के समान है, जो महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमले या आपराधिक बल से संबंधित है।)
निर्णय
समझौते और आरोपों की प्रकृति को देखते हुए, दिल्ली हाईकोर्ट ने FIR संख्या 349/2025 और उससे जुड़ी सभी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
हालांकि, याचिकाकर्ताओं को तत्काल राहत देने से आगे बढ़ते हुए, कोर्ट ने शिकायतों में हेरफेर करने की प्रथा पर रोक लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए।
कोर्ट ने निर्देश दिया:
“इस आदेश की एक प्रति DCP को भेजी जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शिकायत में ऐसी कोई भी मनगढ़ंत बात न जोड़ी जाए जो शिकायतकर्ता द्वारा नहीं कही गई हो।”
हाईकोर्ट ने इन निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा किया।
केस विवरण:
केस टाइटल: तेनजिन योटेन और अन्य बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार और अन्य
केस नंबर: W.P.(CRL) 4174/2025
कोरम: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा
याचिकाकर्ताओं के लिए वकील: श्री राजीव कुमार और सुश्री प्रिया सिंह
प्रतिवादियों के लिए वकील: श्री संजय लाओ, स्थायी वकील (राज्य); श्री जितेंद्र तोमर, प्रतिवादी संख्या 2 के लिए अधिवक्ता

