प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल के ‘किराया माफी’ वाले आदेश को किया रद्द

दिल्ली हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने साल 2021 के उस सिंगल-जज के आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा गरीब किरायेदारों का किराया भरने का वादा कानूनी रूप से लागू करने योग्य है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिए गए बयानों को अदालतों द्वारा लागू किया जाने वाला कानूनी वादा नहीं माना जा सकता। बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार को ऐसा कोई आश्वासन लागू करने के लिए ‘रिट ऑफ मैंडमस’ (Writ of Mandamus) के जरिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

यह पूरा विवाद 29 मार्च 2020 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा की गई एक घोषणा से शुरू हुआ था। महामारी के कारण लगे देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान, मुख्यमंत्री ने गरीब किरायेदारों की दुर्दशा को देखते हुए कहा था कि यदि कोई किरायेदार गरीबी के कारण किराया देने में असमर्थ है, तो सरकार उनकी ओर से भुगतान करेगी। इस भरोसे के आधार पर पांच दिहाड़ी मजदूरों और एक मकान मालिक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सरकार से इस वादे को पूरा करने की मांग की।

जुलाई 2021 में, सिंगल-जज बेंच ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि मुख्यमंत्री का वादा लागू किया जा सकता है और दिल्ली सरकार को एक निश्चित समय सीमा के भीतर इस पर नीति बनाने का निर्देश दिया था। दिल्ली सरकार ने इस फैसले को डिवीजन बेंच में चुनौती दी और तर्क दिया कि मुख्यमंत्री का बयान केवल मकान मालिकों से एक मानवीय अपील थी, न कि कोई ठोस कानूनी अनुबंध।

दिल्ली सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि मुख्यमंत्री के शब्द संकट के समय मकान मालिकों से संयम बरतने की एक भावुक अपील मात्र थे। सरकार का कहना था कि प्रशासन ने केवल यह कहा था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वह इस मुद्दे पर विचार करेगा, लेकिन इससे सरकार पर कोई निश्चित वित्तीय देनदारी नहीं बनती।

वहीं, याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि कार्यपालिका के प्रमुख ने जनता के सामने एक स्पष्ट प्रतिनिधित्व किया था। उन्होंने दलील दी कि इससे उन कमजोर नागरिकों के मन में एक ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) पैदा हुई, जो राज्य के वित्तीय सहायता के आश्वासन पर भरोसा करके अपने किराए के घरों में रुके रहे।

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जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की डिवीजन बेंच ने प्रशासनिक औपचारिकताओं से बाहर दिए गए मौखिक आश्वासनों की कानूनी वैधता की जांच की। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए संबोधन को न्यायपालिका द्वारा लागू किए जाने वाले कानूनी वादे के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके अलावा, बेंच ने रेखांकित किया कि सरकार को अनौपचारिक आश्वासनों को लागू करने के लिए बाध्य करने हेतु कोई रिट जारी नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने यह भी गौर किया कि मुख्यमंत्री का यह बयान किसी भी आधिकारिक सरकारी आदेश का हिस्सा नहीं था, जिसमें उसी दिन जारी किए गए दिल्ली आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) के निर्देश भी शामिल थे। बेंच ने पाया कि यह घोषणा एक आपातकालीन स्थिति की प्रतिक्रिया लग रही थी, जहां इसके दीर्घकालिक वित्तीय और व्यावहारिक प्रभावों का आकलन नहीं किया गया था। हालांकि कोर्ट ने माना कि दिल्ली सरकार किरायेदारों की मदद के लिए नीतिगत निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन न्यायपालिका राज्य को ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।

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डिवीजन बेंच ने दिल्ली सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए 2021 के पिछले आदेश को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि मार्च 2020 की घोषणा को लागू करने की मांग कानून में मान्य नहीं है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रवासी किरायेदारों को बड़ी राहत देते हुए यह तय किया कि मकान मालिक उस विशिष्ट अवधि का किराया नहीं मांग सकते, जब किरायेदार लॉकडाउन के कारण अपने घरों से बाहर निकलने या जाने में असमर्थ थे। यह लाभ कड़ाई से केवल लॉकडाउन की अवधि तक ही सीमित है और उसके बाद लागू नहीं होगा। इन टिप्पणियों के साथ, हाईकोर्ट ने बिना किसी खर्च (Costs) के अपील का निपटारा कर दिया।

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