दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें मुआवजे के दावे को सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि ट्रेन के प्रस्थान का समय सुबह 3:00 बजे का था, जिसे ट्रिब्यूनल ने यात्रा के लिए ‘अजीब समय’ (Odd Time) माना था। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने मामले को वापस ट्रिब्यूनल भेजते हुए स्पष्ट किया कि ट्रिब्यूनल का निष्कर्ष पूरी तरह से “कयासों और अनुमानों” (Conjectures and Surmises) पर आधारित था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील प्रियंका और अन्य बनाम भारत संघ के शीर्षक से दायर की गई थी। इसमें रेलवे दावा अधिकरण, दिल्ली के 12 दिसंबर 2019 के फैसले को चुनौती दी गई थी। अपीलकर्ताओं (मृतक सुमित के कानूनी वारिस) के अनुसार, 17 दिसंबर 2017 को सुमित वैध टिकट के साथ बोडाकी से दिल्ली शाहदरा की यात्रा कर रहे थे।
दावे के अनुसार, जैसे ही ट्रेन शाहदरा रेलवे स्टेशन के पास पहुंची, सुमित गलती से ट्रेन से गिर गए और उन्हें गंभीर चोटें आईं। उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि मृतक न तो वास्तविक यात्री (Bona fide passenger) था और न ही यह घटना रेलवे अधिनियम, 1989 के तहत “अप्रिय घटना” (Untoward Incident) थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि मृतक के पास 10 रुपये का वैध टिकट था, जिसे घटना के बाद मृतक के भाई ने पुलिस (ASI) को सौंपा था। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल ने केवल इस आधार पर उन्हें वास्तविक यात्री मानने से इनकार कर दिया कि सर्दियों में सुबह 3:00 बजे बोडाकी पहुंचना और वहां से ट्रेन पकड़ना ट्रिब्यूनल को “असंभव” लगा।
दूसरी ओर, भारत संघ (रेलवे) के वकील ने ट्रिब्यूनल के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि प्रस्तुत किया गया टिकट विश्वसनीय नहीं था और मृतक संभवतः रेलवे ट्रैक को अनाधिकृत रूप से पार कर रहा था। रेलवे ने डीआरएम (DRM) रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि शव “नॉर्थ लाइन” पर मिला था, जबकि ट्रेन “लाइन नंबर 4” पर आई थी, जो आपस में सटी हुई नहीं थीं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने दो मुख्य मुद्दों पर विचार किया: क्या मृतक वास्तविक यात्री था और क्या यह घटना एक ‘अप्रिय घटना’ थी।
वास्तविक यात्री (Bona Fide Passenger) के दर्जे पर: हाईकोर्ट ने ट्रेन के समय को लेकर ट्रिब्यूनल के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने माना था कि चूंकि ट्रेन “अजीब समय” (सुबह 3 बजे) पर चली थी, इसलिए मृतक यात्री नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति ओहरी ने इसे “काल्पनिक और रिकॉर्ड द्वारा असमर्थित” करार देते हुए कहा:
“यह असामान्य नहीं है कि लोग अपने गंतव्य पर जल्दी पहुंचने के लिए रात की यात्रा करते हैं।”
कोर्ट ने नोट किया कि ट्रेन सिग्नल रिकॉर्ड (TSR) के अनुसार ट्रेन सुबह 4:57 बजे प्लेटफॉर्म नंबर 4 पर पहुंची थी, जो घटना के समय से मेल खाता है। कोर्ट ने माना कि टिकट की बरामदगी और गवाहों के बयानों ने अपीलकर्ताओं के दावे को साबित कर दिया है कि मृतक एक वास्तविक यात्री था।
अप्रिय घटना (Untoward Incident) पर: ट्रिब्यूनल ने एक्सीडेंटल फॉल (Accidental Fall) के सिद्धांत को आंशिक रूप से इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि मेडिको-लीगल केस (MLC) में किसी फ्रैक्चर का उल्लेख नहीं था। हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के मूल्यांकन में एक बड़ी तथ्यात्मक त्रुटि पाई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से “बाईं ओर 1 से 8 पसलियों के फ्रैक्चर-dislocation और पेल्विक हड्डियों के फ्रैक्चर” का उल्लेख था, जो गिरने से आई गंभीर चोटों की पुष्टि करता है।
शव के स्थान के संबंध में, कोर्ट ने डीआरएम रिपोर्ट को अविश्वसनीय माना क्योंकि यह बिना किसी स्वतंत्र गवाह के तैयार किए गए “नक्शा मौका” पर आधारित थी। कोर्ट ने कहा:
“शव का स्थान, भले ही स्वीकार कर लिया जाए, अपने आप में यह साबित नहीं करता कि यह रन-ओवर (ट्रेन की चपेट में आने) का मामला है… गिरने के बाद मृतक के पास की पटरी की ओर जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।”
कानूनी सिद्धांत: कोर्ट ने दोहराया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124A एक लाभकारी कानून है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले भारत संघ बनाम प्रभाकरन विजय कुमार का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि इन प्रावधानों की व्याख्या इस तरह की जानी चाहिए जिससे रेलवे दुर्घटनाओं के पीड़ितों को राहत प्रदान करने का उद्देश्य पूरा हो सके, न कि तकनीकी आधारों पर इसे नकारा जाए।
निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील दायर करने में हुई 255 दिनों की देरी को अपीलकर्ताओं की आर्थिक स्थिति और महामारी के दौरान समय सीमा पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को देखते हुए माफ कर दिया।
न्यायमूर्ति ओहरी ने ट्रिब्यूनल के फैसले को रद्द करते हुए कहा:
“मौजूदा मामले में ट्रिब्यूनल ने सबूतों का अत्यधिक कठोर मानक अपनाया और अधिनियम के लाभकारी उद्देश्य की अनदेखी की… ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष कयासों पर आधारित हैं और तय कानूनी स्थिति के विपरीत हैं।”
मामले को कानून के अनुसार मुआवजा देने के लिए वापस ट्रिब्यूनल भेज दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि 27 फरवरी 2026 को पहली सुनवाई के दो महीने के भीतर मुआवजे का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: प्रियंका और अन्य बनाम भारत संघ
- केस नंबर: FAO 55/2021
- कोरम: न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी

