दिल्ली हाईकोर्ट ने पति और ससुराल वालों के खिलाफ बच्चे से मुलाकात के दौरान भ्रामक दावे करने पर महिला पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया

दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महिला द्वारा दायर अवमानना याचिका को खारिज कर दिया है और उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया है। याचिकाकर्ता ने अपने अलग रह रहे पति और ससुराल वालों पर अदालत द्वारा आदेशित बच्चे से मुलाकात (चाइल्ड विजिटेशन) के दौरान जानबूझकर विवाद उत्पन्न करने और दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करने के आरोप लगाए थे। हालांकि कोर्ट ने पाया कि असल में याचिकाकर्ता स्वयं और उसके साथ मौजूद लोग ही टकराव की जड़ थे और मुलाकात में व्यवधान उन्होंने ही डाला था।

यह फैसला न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रेनू भटनागर की खंडपीठ ने CONT.CAS(C) 1741/2023 में सुनाया। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अवमानना की कार्यवाही का उपयोग किसी को परेशान करने के उद्देश्य से गढ़ी गई कहानियों के आधार पर नहीं किया जा सकता।

मामला क्या था?

महिला, जिसकी ओर से अधिवक्ता श्रीमती शंभवी ने पैरवी की, ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए आरोप लगाया था कि उसका पति फैमिली कोर्ट-02, साकेत द्वारा 7 अक्टूबर 2023 को पारित आदेश का उल्लंघन कर रहा है। इस आदेश के अनुसार, पति को बच्चों से विशेष शर्तों के तहत मिलने की अनुमति दी गई थी — जैसे कि वह अपने परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ नहीं आ सकता और मुलाकात के दौरान कोई वीडियो या फोटो नहीं ले सकता।

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बाद में, हाईकोर्ट ने 9 नवम्बर 2023 को अपने आदेश द्वारा इस व्यवस्था में संशोधन करते हुए दिवाली (12 नवम्बर 2023) के अवसर पर पति को अपने माता-पिता के साथ याचिकाकर्ता के कार्यालय में बच्चों से मिलने की अनुमति दे दी। हालांकि, बाद में महिला ने पति को सूचित किया कि दिवाली के धार्मिक अनुष्ठानों के चलते कार्यालय उपलब्ध नहीं रहेगा और उसने एकतरफा रूप से पास के एक को-वर्किंग स्पेस में मुलाकात की व्यवस्था कर दी तथा उसके खर्च का भुगतान पति से माँग लिया।

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अवमानना याचिका में आरोप

महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि पति (प्रतिवादी संख्या 1) ने जानबूझकर मुलाकात के दौरान अशांति फैलाई, उसे और उसके परिवार को डराया-धमकाया और वीडियो रिकॉर्डिंग व फोटोग्राफी करके अदालत के आदेश का उल्लंघन किया। उसने यह भी दावा किया कि पति का यह आचरण उसकी पेशेवर छवि को नुकसान पहुंचाने और उसका आत्मविश्वास तोड़ने के लिए था।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से:
अधिवक्ता श्रीमती शंभवी ने दलील दी कि प्रतिवादी का आचरण कोर्ट के आदेश की जानबूझकर अवहेलना था। उन्होंने आरोप लगाया कि वह जानबूझकर उकसाने, बिना सहमति रिकॉर्डिंग करने और मानसिक उत्पीड़न के इरादे से वहां आया था।

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प्रतिवादियों की ओर से:
अधिवक्ताएं श्रीमती श्रेया सिंघल, श्रीमती एम. केडित्सु और श्री कुशाग्र सिंगला ने सभी आरोपों को नकारते हुए कहा कि मुलाकात पूरी तरह 9 नवम्बर 2023 के हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार ही की गई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से पति के माता-पिता को साथ लाने की अनुमति थी। उन्होंने यह भी कहा कि स्थान की बुकिंग का खर्चा देने की माँग अदालत द्वारा निर्देशित नहीं थी और महिला का घटनाक्रम का वर्णन अतिरंजित और भ्रामक था।

कोर्ट का अवलोकन

कोर्ट ने याचिका की जांच की और कई विसंगतियाँ पाईं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि याचिकाकर्ता ने अपने आरोपों के समर्थन में कोई वीडियो साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया था। जब सुनवाई के दौरान उससे वीडियो दिखाने को कहा गया, तो उसने अपने लैपटॉप से रिकॉर्डिंग प्रस्तुत की।

वीडियो देखने के बाद कोर्ट ने अहम टिप्पणी की:

“यह याचिकाकर्ता और उसके साथ मौजूद लोग ही थे जिन्होंने प्रतिवादी संख्या 1 को उकसाया, जिसके कारण उसने प्रतिक्रिया दी।”

कोर्ट ने यह भी देखा कि प्रतिवादी के पिता (प्रतिवादी संख्या 2) ने शांति बनाए रखने और मुलाकात को व्यवधान रहित तरीके से पूरा करने के लिए याचिकाकर्ता के समूह से कई बार निवेदन किया, लेकिन उसका मजाक उड़ाया गया और उसे नजरअंदाज किया गया।

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इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि 9 नवम्बर 2023 के आदेश में प्रतिवादी को मुलाकात के स्थान का खर्च वहन करने का कोई निर्देश नहीं था। याचिकाकर्ता द्वारा एकतरफा रूप से यह मांग करना कानूनी रूप से निराधार था।

“कोई आदेश प्रतिवादी संख्या 1 को स्थान का खर्च वहन करने के लिए बाध्य नहीं करता,” कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा।

अंतिम निर्णय और जुर्माना

कोर्ट ने कहा कि यह अवमानना याचिका न केवल निराधार है बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, और इसका उद्देश्य प्रतिवादियों को परेशान करना था, न कि कोई वास्तविक शिकायत उठाना।

इसी के तहत, हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता पर ₹50,000 का कुल जुर्माना लगाया, जिसमें निम्नलिखित निर्देश दिए गए:

  • ₹25,000 प्रतिवादी (पति) को अदा किए जाएं,
  • ₹25,000 दिल्ली हाईकोर्ट अधिवक्ता कल्याण कोष में जमा किए जाएं,
  • यह राशि आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी।

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