दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: EWS छात्रों को अब यूनिफॉर्म के बदले मिलेगी नकद राशि, कोर्ट ने संशोधित किया अपना पुराना आदेश

दिल्ली हाईकोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) और वंचित समूह (DG) के छात्रों को स्कूल यूनिफॉर्म “वस्तु के रूप में” (Strictly in kind) उपलब्ध कराने के अपने पुराने आदेश को संशोधित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने दिल्ली सरकार की व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए अब छात्रों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से नकद सब्सिडी देने की अनुमति प्रदान की है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2011 के नियमों के तहत सरकार यूनिफॉर्म देने के लिए बाध्य है, लेकिन यह अनिवार्य नहीं है कि यूनिफॉर्म भौतिक रूप में ही दी जाए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मुख्य रूप से एक रिट याचिका (W.P.(C) 3684/2013 – जस्टिस फॉर ऑल बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार) से जुड़ा है, जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) के कार्यान्वयन के लिए दायर की गई थी। याचिका का उद्देश्य दिल्ली के निजी और सहायता प्राप्त स्कूलों में EWS और DG श्रेणी के छात्रों को मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और अध्ययन सामग्री सुनिश्चित करना था।

इससे पहले, 13 अप्रैल 2023 को हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं का निपटारा करते हुए एक अवमानना याचिका को यह निगरानी करने के लिए लंबित रखा था कि क्या सरकार वास्तव में यूनिफॉर्म दे रही है या उसके बदले नकद राशि दी जा रही है। उस समय कोर्ट ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा था कि भौतिक यूनिफॉर्म के बजाय नकद राशि क्यों दी जा रही है।

इसके बाद, दिल्ली सरकार (प्रतिवादी) ने 13 अप्रैल 2023 के आदेश की समीक्षा के लिए एक पुनर्विचार याचिका (Review Pet. 475/2025) दायर की। सरकार ने कोर्ट से अनुरोध किया कि यूनिफॉर्म को केवल “वस्तु के रूप में” देने की शर्त को संशोधित किया जाए और 10 मई 2025 के कैबिनेट निर्णय और 10 जून 2025 की नीति के तहत DBT लागू करने की अनुमति दी जाए।

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पक्षकारों की दलीलें

दिल्ली सरकार (GNCTD) की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि यद्यपि राज्य यूनिफॉर्म प्रदान करने के लिए बाध्य है, लेकिन इसे वस्तु के रूप में वितरित करने की प्रक्रिया में भारी लॉजिस्टिक चुनौतियां हैं। कोर्ट के समक्ष निम्नलिखित कठिनाइयां रखी गईं:

  • हर स्कूल की यूनिफॉर्म का रंग और डिजाइन अलग-अलग होता है, जिससे प्रबंधन करना मुश्किल हो जाता है।
  • हर छात्र का माप लेना और सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से निविदाएं (tenders) जारी करना एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया है।
  • कपड़ा खरीदने और उसे सिलवाने की प्रक्रिया में अक्सर देरी होती है, जिससे छात्रों को समय पर यूनिफॉर्म नहीं मिल पाती।

सरकार ने कहा कि उसने अपनी जिम्मेदारी को प्रभावी ढंग से निभाने के लिए प्रतिपूर्ति राशि बढ़ा दी है (छात्रों को 1250 रुपये से 1700 रुपये तक का भुगतान) ताकि यूनिफॉर्म सीधे खरीदी जा सके।

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दूसरी ओर, याचिकाकर्ता के वकील श्री खगेश बी. झा ने इस दलील का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि जनादेश यूनिफॉर्म को वस्तु के रूप में प्रदान करने का है और सरकार की नई नीति कोर्ट के पिछले निर्देशों के विपरीत है।

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा बताई गई कठिनाइयों को “वास्तविक” (Genuine) माना। खंडपीठ ने स्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा:

“निस्संदेह, यह असंभव होगा कि हर छात्र का माप लिया जाए, विभिन्न प्रकार के यूनिफॉर्म के कपड़े के लिए GeM पोर्टल पर ऑर्डर दिया जाए, सामग्री की खरीद के बाद माप के अनुसार यूनिफॉर्म सिलवाई जाए और अंत में नए सत्र की शुरुआत से पहले स्कूलों में वितरित की जाए।”

कोर्ट ने तर्क दिया कि छात्रों को सीधे पैसे देने से यह सुनिश्चित होगा कि उन्हें समय पर यूनिफॉर्म मिल सके। एक महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु पर स्पष्टीकरण देते हुए खंडपीठ ने कहा:

“2011 के नियमों के तहत, यूनिफॉर्म प्रदान करने का जनादेश है, लेकिन नियम यह नहीं कहते हैं कि सरकार को यूनिफॉर्म केवल वस्तु के रूप में (in kind only) ही देनी होगी। इसलिए, याचिकाकर्ताओं का यह आग्रह कि केवल वास्तविक भौतिक यूनिफॉर्म ही प्रदान की जानी चाहिए, स्वीकार नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने सरकारी नीति में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमित गुंजाइश पर भी जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों (फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन कामगार यूनियन और जैकब पुलियेल मामले) का हवाला देते हुए, बेंच ने दोहराया कि जब तक कोई नीति “पूरी तरह से मनमानी या तर्कहीन” न हो या वैधानिक प्रावधानों के विपरीत न हो, कोर्ट को उसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

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कोर्ट ने अपने निरीक्षण में कहा:

“प्रतिवादी द्वारा लिया गया नीतिगत निर्णय यह नहीं दर्शाता है कि इसमें कोई दुर्भावना थी या यह नीति वैधानिक नियमों या संविधान के प्रावधानों के विपरीत है।”

फैसला

हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया और 13 अप्रैल 2023 के अपने आदेश को संशोधित किया। कोर्ट ने दिल्ली सरकार को 10 मई 2025 के कैबिनेट निर्णय और 10 जून 2025 के नीति आदेश के अनुसार डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से यूनिफॉर्म सब्सिडी लागू करने की अनुमति दी।

खंडपीठ ने सरकार को निर्देश दिया कि:

“…यह सुनिश्चित करें कि सरकार द्वारा लिए गए नीतिगत निर्णय के अनुसार पर्याप्त राशि समय रहते और जल्द से जल्द प्रदान की जाए।”

केस डिटेल्स:

केस टाइटल: जस्टिस फॉर ऑल बनाम एनसीटी दिल्ली सरकार

केस नंबर: Review Pet. 475/2025 in W.P.(C) 3684/2013

कोरम: मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद

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