परीक्षक को अंतिम सबमिशन से पहले ‘पहली नज़र में’ अंक संशोधित करने का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट ने DJS मूल्यांकन प्रक्रिया को सही ठहराया

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली न्यायिक सेवा (मेन्स) परीक्षा, 2023 की मूल्यांकन प्रक्रिया को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि परीक्षक (Examiner) के पास उत्तर पुस्तिकाओं को अंतिम रूप से जमा करने से पहले अंकों में संशोधन करने का अधिकार है। जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि परीक्षक द्वारा अंकों में किया गया बदलाव, द्वेषपूर्ण भावना (Mala fide), पूर्वाग्रह या धोखाधड़ी की अनुपस्थिति में, मनमाना नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता प्रेरणा गुप्ता, जो दिल्ली न्यायिक सेवा (DJS) परीक्षा 2023 की उम्मीदवार थीं, ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने आरोप लगाया कि पेपर-I (विधिक ज्ञान और भाषा) में उनके अंकों में गैरकानूनी तरीके से “हेरफेर” (Interpolation) और कटौती की गई है। याचिकाकर्ता को कुल 605 अंक प्राप्त हुए थे, जिससे उन्हें रैंक नंबर 45 (प्रतीक्षा सूची क्रम संख्या 12) पर रखा गया था।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की प्रतियां प्राप्त करने पर, याचिकाकर्ता ने पाया कि दो प्रश्नों के लिए दिए गए अंकों में बदलाव किया गया था:

  • प्रश्न संख्या 5 में अंक 25 से घटाकर 15 कर दिए गए।
  • प्रश्न संख्या 8 में अंक 30 से घटाकर 20 कर दिए गए।

इसके परिणामस्वरूप, फ्रंट शीट पर कुल अंक 191 से बदलकर 171 हो गए, और बाद में गणितीय गणना के कारण इसे 169 कर दिया गया। याचिकाकर्ता का तर्क था कि 20 अंकों की यह कटौती मनमानी और स्पष्टीकरण से परे थी। उनका कहना था कि यदि मूल अंक बरकरार रहते, तो उन्हें मेरिट सूची में 13वां स्थान प्राप्त होता।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता ने स्वयं अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि एक बार कुल अंक दर्ज हो जाने के बाद, परीक्षक का अधिकार समाप्त हो जाता है (Functus officio)। उन्होंने कहा कि यह बदलाव कोई वास्तविक सुधार नहीं बल्कि बाद में किया गया विचार था, जो प्रक्रियात्मक निष्पक्षता का उल्लंघन है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के के.के. वाधवानी बनाम सुनीता सिंह के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया कि इस तरह के हेरफेर ने मूल्यांकन प्रक्रिया को दूषित कर दिया है।

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इसके विपरीत, दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (प्रतिवादी संख्या 1) ने तर्क दिया कि व्यक्तिपरक (Subjective) उत्तरों का मूल्यांकन परीक्षक के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है। उन्होंने कहा कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो उत्तर पुस्तिकाओं को परीक्षा प्राधिकारी को सौंपने से पहले अंकों में संशोधन करने से रोकता हो। प्रतिवादी ने निर्मला सिंह बनाम दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा जताते हुए कहा कि परीक्षक को “पहली नज़र में” (at first blush) अंकों को संशोधित करने का अधिकार है।

चयनित उम्मीदवारों (प्रतिवादी संख्या 2 और 3) के वकील ने तर्क दिया कि नियुक्तियां पहले ही की जा चुकी हैं और याचिकाकर्ता ने प्रक्रिया में भाग लिया था, इसलिए अब वे परिणाम को चुनौती नहीं दे सकतीं। उन्होंने जोर देकर कहा कि परीक्षा मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है और द्वेषपूर्ण भावना की अनुपस्थिति में अंकों का पुनर्मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि अंकों में संशोधन “हेरफेर” के बराबर है। कोर्ट ने कहा कि इस शब्द का अर्थ द्वेषपूर्ण भावना (Mala fide) से है, जिसे परीक्षक के खिलाफ न तो दलील में कहा गया और न ही साबित किया गया।

1. शैक्षणिक मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा खंडपीठ ने इस सिद्धांत को दोहराया कि अदालतों को शैक्षणिक मामलों में संयम बरतना चाहिए। महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड बनाम परितोष भूपेशकुमार सेठ और रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि “परीक्षार्थी को पुनर्मूल्यांकन मांगने का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं है; यह लागू वैधानिक नियमों द्वारा शासित होता है।”

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2. परीक्षक का अंक संशोधित करने का विवेक अंकों में बदलाव के मुख्य मुद्दे पर, कोर्ट ने निर्मला सिंह बनाम दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर भरोसा जताया। पीठ ने कहा:

“परीक्षक के लिए यह खुला है कि वह परीक्षार्थी को ‘पहली नज़र में’ दिए गए अंकों को बदल सकता है या संशोधित कर सकता है… यह मानना कि फ्रंट पेज पर एक बार अंक दर्ज होने के बाद वे अपरिवर्तनीय हो जाते हैं, अकादमिक मूल्यांकन पर एक कृत्रिम और अव्यावहारिक बाधा लगाना होगा, जो जमीनी हकीकत और स्थापित कानून के विपरीत है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि संशोधन तब किए गए थे जब उत्तर पुस्तिकाएं परीक्षक के विशेष अधिकार क्षेत्र में थीं (परीक्षा प्राधिकारी को परिणाम सूचित करने से पहले), इसलिए वे कानूनी रूप से स्वीकार्य थे।

3. मूल्यांकन की व्यक्तिपरकता कोर्ट ने नोट किया कि प्रश्न पूरी तरह से व्यक्तिपरक थे, जिनके लिए अकादमिक निर्णय की आवश्यकता थी। पीठ ने कहा:

“कोई वस्तुनिष्ठ या अचूक मानक मौजूद नहीं है जिसके द्वारा न्यायालय यह निर्धारित कर सके कि प्रारंभिक या संशोधित अंक सही थे। न्यायालय द्वारा ऐसा कोई भी प्रयास परीक्षक की राय के स्थान पर अपनी राय रखने के समान होगा, जिसकी अनुमति नहीं है।”

4. पुनर्मूल्यांकन पर रोक कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि दिल्ली न्यायिक सेवा नियमों के नियम 15 का परिशिष्ट स्पष्ट रूप से पुनर्मूल्यांकन को प्रतिबंधित करता है। फैसले में नोट किया गया कि “प्रमाणित सामग्री त्रुटि या स्पष्ट मनमानेपन” के अभाव में, न्यायालय पुनर्मूल्यांकन का निर्देश नहीं दे सकता।

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5. चयनित उम्मीदवारों पर प्रभाव पीठ ने अनमोल कुमार तिवारी बनाम झारखंड राज्य के तर्क को अपनाया, यह देखते हुए कि उन उम्मीदवारों की नियुक्तियों को परेशान करना अनुचित होगा जो किसी धोखाधड़ी या गलत बयानी के दोषी नहीं थे।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता न्यायिक हस्तक्षेप के लिए आवश्यक मानदंडों को पूरा करने में विफल रही। कोर्ट ने माना कि अंकों को 191 से 171 तक कम करना, और उसके बाद 169 तक गणितीय सुधार करना, मनमानापन स्थापित नहीं करता।

“नतीजतन, इस न्यायालय को कथित मूल अंकों को बहाल करने या विवादित उत्तरों के पुनर्मूल्यांकन का निर्देश देने का कोई औचित्य नहीं मिलता है, परीक्षक की स्वायत्तता और न्यायिक समीक्षा की तय सीमाओं को ध्यान में रखते हुए।”

तदनुसार, रिट याचिका को बिना किसी लागत आदेश के खारिज कर दिया गया।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: प्रेरणा गुप्ता बनाम रजिस्ट्रार जनरल, दिल्ली हाईकोर्ट व अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपी (सी) 10517/2025
  • कोरम: जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला

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