दिल्ली हाईकोर्ट का अहम फैसला: कोमा में पड़े पति की देखभाल के लिए पत्नी को बनाया कानूनी अभिभावक, ‘Parens Patriae’ क्षेत्राधिकार का किया इस्तेमाल

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में प्रोफेसर अलका आचार्य को उनके पति, श्री सलाम खान का कानूनी अभिभावक (Legal Guardian) नियुक्त किया है, जो फरवरी 2025 से ‘वेजीटेव स्टेट’ (Vegetative State) में हैं। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने ‘पैरेंस पैट्रिया’ (Parens Patriae) क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए याचिकाकर्ता को अपने पति की चल और अचल संपत्तियों का प्रबंधन करने का अधिकार दिया, ताकि उनका उचित इलाज और देखभाल सुनिश्चित की जा सके।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता प्रोफेसर अलका आचार्य ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए अपने पति श्री सलाम खान का कानूनी अभिभावक नियुक्त किए जाने की मांग की थी। दोनों का विवाह 28 जून, 1989 को हुआ था और उनके दो बच्चे हैं, जिन्होंने भी इस याचिका का समर्थन किया।

घटनाक्रम के अनुसार, 9 फरवरी, 2025 को श्री सलाम खान को गंभीर “इंट्राक्रानियल हेमरेज” (दिमाग की नस फटना) हुआ। अपोलो अस्पताल, सरिता विहार में उनकी आपातकालीन सर्जरी की गई, लेकिन इसके बावजूद उन्हें होश नहीं आया। 14 मार्च, 2025 को उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई, लेकिन वे कोमा जैसी स्थिति में ही रहे।

याचिका में बताया गया कि मरीज पूरी तरह बिस्तर पर है और उन्हें 24 घंटे नर्सिंग देखभाल की आवश्यकता है। वे भोजन के लिए राइल्स ट्यूब (Ryle’s tube) और सांस लेने के लिए ट्रैचियोस्टोमी ट्यूब (Tracheostomy tube) पर निर्भर हैं। इलाज और घर के खर्च के लिए बड़ी धनराशि की आवश्यकता थी, लेकिन श्री खान के बैंक खाते और म्यूचुअल फंड या तो उनके अकेले के नाम पर थे या संयुक्त रूप से, जिनमें उनके हस्ताक्षर अनिवार्य थे। इस कारण परिवार उन संपत्तियों का उपयोग नहीं कर पा रहा था।

मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट

कोर्ट के निर्देश पर एम्स (AIIMS) द्वारा गठित एक मेडिकल बोर्ड ने मरीज की स्थिति की जांच की। बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में पुष्टि की कि श्री खान ‘वेजीटेव स्टेट’ में हैं। कोर्ट ने नोट किया कि मेडिकल बोर्ड के निष्कर्ष के अनुसार, मरीज “गंभीर न्यूरोलॉजिकल डेफिसिट” से पीड़ित है और अपनी देखभाल करने या कोई भी निर्णय लेने में पूरी तरह असमर्थ है।

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कानूनी शून्य और ‘Parens Patriae’ का सिद्धांत

हाईकोर्ट ने इस मामले में मौजूदा कानूनों का गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPWD Act) में ऐसे व्यक्तियों के लिए अभिभावक नियुक्त करने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है जो कोमा में हैं, लेकिन तकनीकी रूप से “मानसिक बीमारी” से ग्रस्त नहीं हैं।

कोर्ट ने कहा कि जहां RPWD एक्ट “सीमित अभिभावकत्व” (Limited Guardianship) की बात करता है, वहीं कोमा में पड़े व्यक्ति के लिए “पूर्ण अभिभावकत्व” (Plenary Guardianship) की आवश्यकता होती है, क्योंकि वह निर्णय लेने में पूरी तरह अक्षम होता है।

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इस वैधानिक शून्यता (Statutory Vacuum) को देखते हुए, कोर्ट ने ‘पैरेंस पैट्रिया’ (Parens Patriae) के सिद्धांत का सहारा लिया। यह सिद्धांत संवैधानिक अदालतों को उन असहाय नागरिकों के अभिभावक के रूप में कार्य करने का अधिकार देता है जो अपनी देखभाल करने में असमर्थ हैं।

कोर्ट की टिप्पणी और निर्णय

जस्टिस सचिन दत्ता ने कहा कि परिवार को कानूनी उपचार के बिना छोड़ना न्याय के हित और मरीज के कल्याण के खिलाफ होगा। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“जब कोई व्यक्ति कोमा में हो और उसकी संपत्ति लॉक हो, जिससे उसका परिवार उसके इलाज और कल्याण के लिए उसका उपयोग न कर सके, तो कोर्ट मूकदर्शक नहीं बन सकता।”

कोर्ट ने कहा कि विशिष्ट वैधानिक प्रावधान के अभाव में, हाईकोर्ट भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए अभिभावक नियुक्त कर सकता है। तदनुसार, याचिका को स्वीकार करते हुए प्रोफेसर अलका आचार्य को अभिभावक नियुक्त किया गया।

संपत्ति प्रबंधन के निर्देश

हाईकोर्ट ने प्रोफेसर अलका आचार्य को श्री सलाम खान के चिकित्सा और दैनिक खर्चों के लिए उनकी चल-अचल संपत्ति का प्रबंधन करने की स्वतंत्रता दी। विशेष रूप से, उन्हें निम्नलिखित संपत्तियों को हैंडल करने की अनुमति दी गई:

A. श्री सलाम खान के नाम पर संपत्ति:

  • एचडीएफसी बैंक खाते और फिक्स्ड डिपॉजिट
  • कोटक बैंक और एक्सिस बैंक के म्यूचुअल फंड्स
  • टाटा एआईए पॉलिसी
  • वाहन रेनॉल्ट ट्राइबर (Renault Triber)
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B. संयुक्त संपत्ति:

  • द्वारका फेज-I, नई दिल्ली में स्थित फ्लैट (केराली सीजीएचएस लि.)।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता इन संपत्तियों का उपयोग सख्ती से केवल श्री सलाम खान के लाभ और कल्याण के लिए करने के लिए बाध्य होंगी।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: प्रोफेसर अलका आचार्य बनाम जीएनसीटीडी (Govt. of NCT of Delhi) और अन्य

केस नंबर: W.P.(C) 16793/2025

कोरम: न्यायमूर्ति सचिन दत्ता

याचिकाकर्ता के वकील: श्री लज़ाबीर अहमद और श्री कार्तिकेय शर्मा

प्रतिवादी के वकील: सुश्री नितिका भूटानी (जीएनसीटीडी के लिए)

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