“कंडोम का इस्तेमाल हुआ था”: डीएनए सबूत न मिलने पर भी दिल्ली हाईकोर्ट ने 12 साल की सजा को सही ठहराया

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि बलात्कार के मामले में आरोपी का डीएनए (DNA) पीड़िता से मेल नहीं खाता है, तो भी उसे बरी नहीं किया जा सकता, बशर्ते पीड़िता की गवाही विश्वसनीय हो। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने 13 वर्षीय दिव्यांग बच्ची के साथ दुष्कर्म के दोषी राम कुबेर की 12 साल की सजा को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता ने खुद बयान दिया है कि आरोपी ने कंडोम का इस्तेमाल किया था, तो फोरेंसिक सबूतों का न मिलना “समझने योग्य” है।

हाईकोर्ट ने यह फैसला दोषी द्वारा निचली अदालत (ASJ) के निर्णय के खिलाफ दायर आपराधिक अपील (संख्या 109/2025) पर सुनाया। दोषी ने अपनी अपील में मुख्य तर्क यह दिया था कि उसका डीएनए सैंपल पीड़िता से मेल नहीं खाया, इसलिए उसे निर्दोष माना जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना जुलाई 2018 की है। पीड़िता, जिसका बायां हाथ कटा हुआ था, अपनी नानी के साथ रहती थी। आरोपी राम कुबेर उनका पड़ोसी था और पेशे से ट्रक ड्राइवर था। आरोप है कि उसने बच्ची को मांस (meat) खिलाने के बहाने अपने घर बुलाया और उसका यौन शोषण किया।

पीड़िता ने गवाही दी कि उसके साथ 8 दिनों तक गलत काम किया गया और आरोपी ने उसे धमकी दी थी कि अगर उसने किसी को बताया तो वह उस पर ट्रक चढ़ा देगा। 18-19 जुलाई 2018 की रात को यह मामला तब सामने आया जब बच्ची की नानी (PW5), मामी (PW3) और एक पड़ोसी (PW6) ने बच्ची को आरोपी के घर में पाया।

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डीएनए और फोरेंसिक सबूतों पर बहस

बचाव पक्ष की दलीलें आरोपी के वकील ने फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) की रिपोर्ट को अपने बचाव का मुख्य आधार बनाया। उनके तर्क थे:

  • डीएनए मेल नहीं खाया: आरोपी का डीएनए प्रोफाइल पीड़िता के नमूनों से मेल नहीं खाता।
  • जैविक सबूत नहीं: पीड़िता के शरीर या कपड़ों पर आरोपी का कोई भी जैविक निशान (semen) नहीं मिला, जो उसकी बेगुनाही साबित करता है।
  • अस्पष्ट रिपोर्ट: मेडिकल रिपोर्ट में यह साफ नहीं था कि हाइमन (hymen) टूटा था या नहीं, जिसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए।
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अभियोजन पक्ष का जवाब सरकारी वकील ने इसका कड़ा विरोध करते हुए कहा:

  • पीड़िता का बयान: मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 Cr.P.C. के तहत दिए गए बयान में पीड़िता ने साफ कहा था कि आरोपी ने “कंडोम का इस्तेमाल” किया था।
  • अन्य सबूत: भले ही डीएनए मेल नहीं खाया, लेकिन एफएसएल रिपोर्ट में पीड़िता के स्वैब पर मानव वीर्य (human semen) होने की पुष्टि हुई थी, जो यह साबित करता है कि यौन हमला हुआ था।

अदालत का फैसला और तर्क

‘कंडोम एंगल’ और डीएनए की अनुपस्थिति: न्यायमूर्ति कृष्णा ने डीएनए रिपोर्ट पर बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा:

“यह महत्वपूर्ण है कि पीड़िता ने धारा 164 के तहत अपने बयान में कहा था कि आरोपी ने कंडोम का इस्तेमाल किया था। यह तथ्य यह समझाने के लिए काफी है कि आरोपी का वीर्य या डीएनए वहां क्यों नहीं मिला।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि घटना (रात 3 बजे) और मेडिकल जांच (अगले दिन दोपहर 2 बजे) के बीच काफी समय बीत चुका था। इसके अलावा कंडोम के इस्तेमाल की वजह से फोरेंसिक रिपोर्ट का “निर्णायक न होना” (inconclusive) स्वाभाविक है और इससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर नहीं होता।

गवाही की विश्वसनीयता: अदालत ने दोहराया कि यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़िता की गवाही को किसी और सबूत की बैसाखी की जरूरत नहीं होती, अगर वह भरोसेमंद हो। बच्ची के बयानों में मामूली अंतर को उसकी कम उम्र (13 साल) को देखते हुए स्वाभाविक माना गया। कोर्ट ने पाया कि पीड़िता की गवाही उसकी नानी और उस स्वतंत्र गवाह (पड़ोसी) के बयानों से पूरी तरह मेल खाती है जिन्होंने आरोपी को रंगे हाथों पकड़ा था।

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निष्कर्ष 

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि पीड़िता और चश्मदीद गवाहों के बयान आरोपी के खिलाफ “पुख्ता सबूत” (overwhelming evidence) हैं, जो डीएनए सबूत न मिलने की तकनीकी कमी पर भारी पड़ते हैं। इसी आधार पर अपील खारिज कर दी गई और 12 साल की कैद की सजा को बरकरार रखा गया।

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