दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ, जिसमें जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन शामिल हैं, ने हत्या के एक मामले में दो भाइयों की सजा को गैर-इरादतन हत्या (Culpable Homicide not amounting to murder) में बदल दिया है। हाईकोर्ट ने पाया कि 2012 में सिगरेट देने से मना करने पर शुरू हुआ विवाद बिना किसी पूर्व योजना के ‘अचानक हुए झगड़े’ की श्रेणी में आता है, जिसके कारण यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 300 के अपवाद 4 (Exception 4) के दायरे में आता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 29 अगस्त, 2012 का है, जब सुबह करीब 10:30 बजे लाल कुआं के प्रेम नगर बस स्टैंड के पास एक विवाद हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, अपीलकर्ता प्रदीप ने शिकायतकर्ता राजेश और उसके दोस्तों (जिनमें मृतक नीरज भी शामिल था) से सिगरेट मांगी। इनकार करने पर उनके बीच हाथापाई शुरू हो गई। इसके बाद प्रदीप वहां से चला गया और पास के ‘बब्बन ढाबा’ से चाकू लेकर वापस आया।
प्रारंभिक पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, प्रदीप का भाई संजय भी वहां पहुंच गया और उसने कथित तौर पर नीरज को पीछे से पकड़ लिया, जिसके बाद प्रदीप ने नीरज पर वार किया। नीरज के सीने के बाईं ओर चाकू लगने से उसकी मौत हो गई। 2024 में ट्रायल कोर्ट ने दोनों भाइयों को धारा 302/34 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी। उन्होंने कहा कि यह घटना अचानक हुई और गुस्से में आकर झगड़ा बढ़ गया। यह भी तर्क दिया गया कि स्वतंत्र गवाहों ने संजय की भूमिका की पुष्टि नहीं की है और कुछ गवाहों के अनुसार वह घटना के समय वहां मौजूद भी नहीं था। बचाव पक्ष का कहना था कि हाथापाई के दौरान एक बार चाकू मारना हत्या करने के इरादे को नहीं दर्शाता।
दूसरी ओर, राज्य के अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने हत्या की सजा का समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि सीने का बाईं हिस्सा शरीर का नाजुक अंग है और 6.2 सेमी गहरा घाव यह साबित करता है कि हमला जान लेने के इरादे से किया गया था। अभियोजन ने धारा 301 IPC (Transfer of Malice) का हवाला देते हुए कहा कि भले ही निशाना कोई और हो, लेकिन हत्या का उत्तरदायित्व समान रहता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने इस बात की जांच की कि क्या यह मामला धारा 300 IPC के अपवाद 4 के अंतर्गत आता है। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस अपवाद के लिए चार शर्तें जरूरी हैं: कार्य बिना किसी पूर्व योजना के हो, अचानक झगड़ा हुआ हो, आवेश में आकर झगड़ा हुआ हो और अपराधी ने अनुचित लाभ न उठाया हो।
पूर्व योजना के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा:
“विवाद सिगरेट की मामूली मांग पर अचानक शुरू हुआ… प्रदीप मौके पर हथियार लेकर नहीं आया था। हाथापाई के बाद वह ढाबे पर गया और बब्बन सिंह के ढाबे की मेज पर रखा चाकू उठा लाया। वह चाकू घर से नहीं लाया गया था और न ही उसे पहले से तैयार रखा गया था।”
हमले की प्रकृति पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“हाथापाई के दौरान एक बार वार करना, बिना किसी निरंतर हमले के, यह साबित नहीं करता कि अपराधी ने कोई अनुचित लाभ उठाया या क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। मृतक नीरज को चाकू मारने से पहले न तो बंधक बनाया गया था और न ही वह असहाय था।”
कोर्ट ने धारा 34 IPC के तहत संजय की भूमिका की भी समीक्षा की और पाया कि स्वतंत्र गवाहों ने उसे दोषी बताने वाले बयानों का समर्थन नहीं किया है। बेंच ने जोर दिया कि संयुक्त उत्तरदायित्व के नियम के अनुसार, सह-आरोपी की जिम्मेदारी मुख्य अपराधी से अधिक नहीं हो सकती। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह अपराध धारा 304 पार्ट II IPC के तहत आता है, क्योंकि अभियुक्त को यह ज्ञान था कि उसके कार्य से मृत्यु हो सकती है, लेकिन उसका इरादा हत्या करने का नहीं था।
बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के नारायण यादव बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025) मामले का हवाला देते हुए कहा कि ‘अचानक हुए झगड़े’ में दोनों तरफ से उकसावा होता है और ऐसी स्थिति में दोष का सटीक निर्धारण करना कठिन होता है।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने धारा 302/34 IPC के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया और अपीलकर्ताओं को धारा 304 पार्ट II के साथ पठित धारा 34 IPC के तहत दोषी करार दिया।
यह देखते हुए कि अपीलकर्ता सात साल से अधिक समय से जेल में हैं, जस्टिस मधु जैन ने कहा:
“कोर्ट द्वारा पाए गए अपराध की प्रकृति, जेल में बिताई गई लंबी अवधि और किसी भी गंभीर कारक की अनुपस्थिति को देखते हुए, पहले से काटी गई सजा को ही पर्याप्त और उचित माना जाता है।”
हाईकोर्ट ने सजा को अब तक काटी गई अवधि में बदल दिया और दोनों अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना और मृतक के परिवार को दिया जाने वाला मुआवजा बरकरार रहेगा।
मामले का विवरण
- केस टाइटल: संजय बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (और संबंधित अपील)
- केस नंबर: CRL.A. 48/2025 और CRL.A. 65/2025
- कोरम: जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मधु जैन
- तारीख: 8 अप्रैल, 2026

