सेंट्रल दिल्ली में इंटरनेट सेवा बहाल: दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ली गई याचिका

सेंट्रल दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बहाल होने के बाद लीगल सर्विसेज संगठन ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया’ (SFLC.in) ने इसके निलंबन के खिलाफ दायर अपनी जनहित याचिका दिल्ली हाईकोर्ट से वापस ले ली है। सोमवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता द्वारा केस वापस लेने का अनुरोध किए जाने पर अदालत ने याचिका को खारिज कर दिया।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता के वकील ने सूचित किया कि उन्हें याचिका वापस लेने के निर्देश मिले हैं। इसके बाद पीठ ने याचिका को वापस लिया हुआ मानते हुए खारिज कर दिया।

आंदोलन समाप्त होने पर बहाल हुआ इंटरनेट

यह कानूनी चुनौती कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन समाप्त होने के बाद वापस ली गई है। CJP के कार्यकर्ता नीट (NEET) पेपर लीक मामले में सरकार की जवाबदेही तय करने और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर 20 जून से जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे।

शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और सरकार द्वारा CJP की अन्य मांगों को स्वीकार किए जाने के बाद यह एक महीने से अधिक समय से चल रहा आंदोलन खत्म हो गया। आंदोलन समाप्त होते ही प्रशासन ने सेंट्रल दिल्ली में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं फिर से बहाल कर दीं।

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गृह मंत्रालय के आदेशों को दी गई थी चुनौती

सेवाएं बहाल होने से पहले SFLC.in ने अपनी याचिका में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 17, 20, 22 और 23 जुलाई को जारी इंटरनेट निलंबन के आदेशों को रद्द करने की मांग की थी। याचिका में बताया गया था कि प्रशासन ने जंतर-मंतर के लगभग 1.5 किलोमीटर के दायरे में मात्र सात दिनों के भीतर छह अलग-अलग आदेश जारी कर मोबाइल इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगा दी थी।

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संवैधानिक अधिकारों के हनन का लगाया था आरोप

याचिका में तर्क दिया गया था कि टेलीकॉम सेवाओं का अस्थायी निलंबन कार्यपालिका को मिली अत्यंत असाधारण शक्तियों में से एक है, जो संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत नागरिकों को मिले मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है।

संगठन ने इन आदेशों को गैर-कानूनी, मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए कहा कि गृह मंत्रालय सार्वजनिक आपातकाल या सार्वजनिक सुरक्षा के खतरे को साबित करने में विफल रहा। याचिका के अनुसार, अधिकारियों ने टेलीकॉम एक्ट की धारा 20 और सस्पेंशन रूल्स, 2024 का हवाला तो दिया, लेकिन पूरी तरह इंटरनेट बंद करने से पहले कम सख्त विकल्पों पर विचार नहीं किया। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि ये आदेश प्रशासनिक नियमों के विपरीत बिना स्वतंत्र विचार किए यांत्रिक तरीके से जारी किए गए थे।

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