सीनियर सिटीजन एक्ट का इस्तेमाल करके बहू के घरेलू हिंसा कानून के अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट ने घर से निकालने पर रोक लगाई

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक बहू को उसके साझा घर (Shared Household) से बेदखल करने के आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act) और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDV Act) के प्रावधानों के बीच सामंजस्य बनाना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे को लेकर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए जिला मजिस्ट्रेट (पश्चिम), जीएनसीटीडी द्वारा 5 अप्रैल, 2025 को बेदखली मामले (Eviction Case No. 692/DCW/2022) में पारित आदेश को चुनौती दी थी। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने दिल्ली मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स रूल्स, 2009 के नियम 22(3)(4) के तहत अपीलीय प्राधिकारी (डिविजनल कमिश्नर) द्वारा पारित परिणामी आदेशों को भी चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि इन आदेशों के कारण उन्हें उनके निवास स्थान से बेदखल किए जाने का तत्काल खतरा पैदा हो गया है।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री ओसामा सुहैल ने दलील दी कि विवादित आदेशों में एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून के आलोक में विवाद की जांच नहीं की गई।

वकील ने बताया कि याचिकाकर्ता के पक्ष में PWDV अधिनियम के तहत एक विशिष्ट आदेश पहले से मौजूद है। उन्होंने तीस हजारी कोर्ट के एमएम-05 (पश्चिम) द्वारा 18 अगस्त, 2022 को शिकायत संख्या 2488/2019 में पारित आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

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“प्रतिवादीगण को उस साझा घर के कमरे में प्रवेश करने से रोका जाता है जिसमें याचिकाकर्ता रह रही है।”

यह तर्क दिया गया कि बेदखली के आदेश पारित करते समय अधिकारियों द्वारा इस सुरक्षा आदेश के दायरे और महत्व की सही परिप्रेक्ष्य में जांच नहीं की गई थी।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

वेकेशन बेंच की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस सचिन दत्ता ने दलीलों और याचिकाकर्ता द्वारा एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021) 15 SCC 730 मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दिए गए जोर पर विचार किया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी को नोट किया जिसमें कहा गया था कि सीनियर सिटीजन एक्ट, 2007 और PWDV एक्ट, 2005 अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं, लेकिन इनकी व्याख्या सामंजस्यपूर्ण तरीके से की जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने एस. वनिता के फैसले के प्रासंगिक हिस्से को उद्धृत किया:

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“वरिष्ठ नागरिकों के हितों की रक्षा करने वाले कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उन्हें बेसहारा न छोड़ दिया जाए, या वे अपने बच्चों या रिश्तेदारों की दया पर न रहें। समान रूप से, वैधानिक व्याख्या की आड़ में PWDV अधिनियम, 2005 के उद्देश्य की अनदेखी नहीं की जा सकती। दोनों कानूनों का अर्थान्वयन सामंजस्यपूर्ण तरीके से किया जाना चाहिए। इसलिए, साझा घर के संबंध में निवास आदेश सुरक्षित करने के एक महिला के अधिकार को सीनियर सिटीजन एक्ट 2007 के तहत संक्षिप्त प्रक्रिया (summary procedure) अपनाकर बेदखली का आदेश प्राप्त करने के साधारण उपाय से हराया नहीं जा सकता।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट के दृष्टांत (Precedent) और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि डिविजनल कमिश्नर के समक्ष अपील के लंबित रहने के दौरान याचिकाकर्ता के पक्ष में एक अंतरिम आदेश मौजूद था, हाईकोर्ट ने अंतरिम राहत प्रदान की।

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कोर्ट ने आदेश दिया:

“इस बीच, उपरोक्त पहलुओं पर विचार करते हुए, और यह देखते हुए कि डिविजनल कमिश्नर के समक्ष अपील संख्या 1121/2025 के लंबित रहने के दौरान याचिकाकर्ता के पक्ष में एक अंतरिम आदेश मौजूद था, यह निर्देश दिया जाता है कि संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे के संबंध में यथास्थिति अगली सुनवाई की तारीख तक बनाए रखी जाएगी।”

हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया और उन्हें तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी, 2026 को तय की गई है।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: रश्मि @ पूजा बाहरी बनाम नीना बाहरी और अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपी (सी) 19838/2025
  • कोरम: जस्टिस सचिन दत्ता
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री ओसामा सुहैल, सुश्री सुमाना सुहैल, सुश्री सानिया गंडोत्रा और सुश्री पूजा केसरवानी।

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